भरोसे की नैया

श्रीमती विजय लक्ष्मी सिंह

तुम हो जब सारथी मेरे,
हम बेफ़िक्र से खड़े।
मन, वचन, कर्म शुद्ध रहें
यही नित्य याचना करे।

तुम सर्वशक्तिमान हो,
सारी व्यथा को जानते।
तुमसे क्यों और क्या कहें,
रग-रग में बसे हो मेरे।
तुम हो जब सारथी मेरे…

तुम पर भरोसा करके ही
दूर मंज़िल तक चले।
कभी न डगमगाने दिया,
अपनी पनाह में रख लिये।

सद्गुरु की कृपा बनी रही,
तुम अंग-संग हो सदा।
किस बात की फ़िकर हमें,
जब माफ़ की सारी ख़ता।
तुम हो जब सारथी मेरे…

हम ज़िक्र में तुम्हारे
हरदम मगन रहें।
तुम फ़िक्र में रहे मेरी,
पतवार थामे रहे।

ये स्वप्न जो दिखाया
बैठे परमधाम से
हम सबने सोचा, सच है
ये खेल-खेल में।
तुम हो जब सारथी मेरे…

हम भटके हुए राही थे
इस फ़ानी दुनिया के।
तुमने हमें जगाया, धनी,
घोर नींद से।

तुम सत्य के व्यापारी,
बाँटते भी सत्य हो।
अब नैया पार होगी
इसी नेक काम से।
तुम हो जब सारथी मेरे…

4 thoughts on “भरोसे की नैया

    1. जय श्री कृष्णा वो ही पालनहार। सुन्दर लेखन 🌹

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