
मनमीत सोनी, सहायक आचार्य, शहीद भगत सिंह विधि महाविद्यालय, सीकर ( राजस्थान )
बनियान,
बनियान पर टी-शर्ट,
टी-शर्ट पर आधी बाँहों की स्वेटर,
आधी बाँहों की स्वेटर पर लेदर की जैकेट,
जींस और जूते पहनकर
मैं एक नंगे बच्चे से मिला!
उसने मुझे रोका नहीं।
मैं खुद ही रुक गया
शर्म से गड़ा हुआ,
नीची आँखें किए।
मैंने उससे पूछा उसका नाम।
नाम बताया-हितेश!
हितेश से पूछा मैंने-
पापा क्या करते हैं?
बोला: दारू पीते हैं।
माँ क्या करती है?
बोला: रजाई बेचती है।
कहाँ से आए हो?
-मुरादाबाद से।
कब तक रहोगे?
-जब तक ठंड है।
स्कूल जाते हो?
-नहीं जाता।
क्या खाते हो?
-दाल, रोटी और चटनी।
कपड़े क्यों नहीं पहने?
–हैं नहीं साहब।
मैंने पूछा: रहते कहाँ हो?
बोला: नीम के नीचे।
मैंने पूछा: ठंड नहीं लगती?
बोला: जो रजाई बेचते हैं, उसी को ओढ़ लेते हैं।
मैंने पूछा: बड़े होकर क्या बनोगे?
बोला: रजाई की पक्की दुकान खोलूँगा।
पसीने छूट गए मेरे।
बनियान चिपक गई।
माथे पर छलछला आईं बूंदें।
हाथ ठंडे पड़ गए।
रेस नहीं दी गई स्कूटर की।
मैंने अपनी जैकेट पहनाई उसे-
इतनी बड़ी जैकेट
कि लपेट कर बैठ गया वह स्कूटर के पीछे।
उसे छोड़ आया उसकी माँ के पास,
नीम के नीचे।
बाप लेटा था फुटपाथ पर।
पास में “ढोला मारु” की कच्ची शराब की बोतल।
सौ रुपये का नोट दिया—
माँ ने लेने से मना कर दिया।
बोली: रजाई ले लो साहब।
मैंने कहा: घर पर पहले से बहुत हैं।
बोली: देख तो लो साहब!
मैंने कहा: लेनी ही नहीं तो क्यों देखूँ?
लौटने लगा मैं।
स्कूटर घुमा लिया।
हितेश ने मेरी जैकेट मुझे वापस दी।
अंदर से “फॉग” की डियो की बोतल लाई,
और छिड़क दिया मेरी जैकेट पर।
वही फॉग की बोतल
जिसे इसलिए रखती थी उसकी माँ
कि अपनी ओढ़ी हुई रजाइयों पर छिड़ककर
मिटा सके ग्राहकों के लिए अपने शरीरों की बदबू।
कुछ पूछता, इससे पहले ही
हितेश बोल पड़ा-
“हमसे बहुत बदबू आती है अंकल।
अब आपकी जैकेट से बदबू नहीं आएगी।”
सन्न रह गया मैं।
जैकेट पहनी ही नहीं गई।
सर्दी में मरता हुआ घर आया।
जैकेट टांग दी हेंगर में।
देखता रहा-
जैकेट से रिसता हुआ ख़ून।
चाय लाई पत्नी।
बोली: बैठ जाओ रजाई में।
नहीं बैठ सका।
उघाड़ कर दूर फेंक दी।
देखता रहा-
अपने भीतर कुछ घंटों का आंदोलन
जो रात होते-होते
समर्पण कर देगा…
ऐसे ही समर्पणों से
बढ़ रही है दुनिया में ठंड-
इतनी ठंड
कि कहीं नहीं बची आग।
सिर्फ हितेश चमकता है
बीड़ी के सिरे पर
एक अंगार की तरह-
दस डिग्री टेम्परेचर में!
टीवी पर
बड़ी बेशर्मी से पूछ रहा है
इक्कीसवीं सदी का भारत-
“क्या चल रहा है?”
और
बड़ी बेशर्मी से जवाब दे रहा है कोई भारतीय—
“फॉग चल रहा है साहब।”
पढ़ कर कुछ समय के लिए में भी उसी बच्चे के साथ नीम के पेड़ तक पहुंच गई उस ठंडी रात में । जहां हम घर में रजाई स्वेटर पहने शाम के बाद घरों में कैद हो जाते है वहीं न जाने कितने हितेश जैसे बच्चे नीम के पेड़ के नीचे रात गुजरते है ।
बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता बहुत अच्छी लगी भारत की सच्ची तस्वीर है
बंशीलाल परमार
Excellent 👌
लेखक ने शानदार गरीब बच्चे का चित्रण किया,यह उस गरीब बच्चे का चित्रण नहीं, बल्कि देश में अनेक ऐसे बच्चों की कहानी है, जिससे निजात पाना जरूरी है,
आदरणीय मंडोवराजी आपकी अनमोल टिप्पणी लेखकों का उत्सावर्धन करेगी
लेखक महोदय ने जो लिखा दिल नम कर दिया बहुत अच्छा लिखा और सही लिखा 🙏
यथार्थ को दर्शाते हुए हृदय को छू जाने वाली रचना के लिए रचनाकार को साधुवाद ।
DIL KO CHHU GAI
बहुत शानदार
Bahot khub
बहुत सुंदर
अपना अहंकार लिए,कोई किससे क्या बोलें।
मदहोश अपनी मस्ती में, कोई किससे क्या बोलें।।
देखी किसी गरीब की,अमीरी उसकी आंखों में।
झुका ली नजरें, कोई किससे क्या बोलें।।
मानसदर्पण
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बेहद ही मर्मस्पर्शी…
आज देश में चारों तरफ़ विकास की बातें हो रही हैं. चकाचौंध शहरों की रोशनी बढ़ती जा रही है, गांवों के जीवन को विकास की पटरी पर लाने के दावें ठोके जा रहे हैं. लेकिन सच्चाई जमीनी धरातल पर कुछ और ही है, उसका एक छोटा सा उदाहरण यह बच्चा है. ऐसे कितने ही बच्चे हैं, जिन्हें पढ़ाई तो दूर, खाने को रोटी और रहने को छत मुश्किल से नसीब होती है. सरकार की योजनाओं का लाभ इन्हें मुश्किल से मिल पाता है. क्योंकि इन योजनाओं लाभ लेने के लिए माँ-बाप के चप्पल घिस जाते हैं और वें हार मानकर किस्मत से समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं. इसलिए जरूरत है इसे लचीले सरकारी नियम- कायदों की जिसका लाभ आसानी से इन जरूरतमंदों तक पहुँच सके. और फिर कोई हितेश नीम के पेड़ के नीचे सोने को मजबूर न हो.
हार्दिक आभार, मोनिकाजी
आपने बहुत सुंदर टिप्पणी की है. आपकी अमूल्य टिप्पणी हमारे लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी
निशब्द। शालिनी जी की तरह ही मैं भी हितेश को छूकर लौटी ।
अंदर तक झकझोर देने वाली रचना
समझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूं, मार्मिक रचना,छू गई दिल को,
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