
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था। जब अनिता ने स्कूल जॉइन किया, तो वह स्कूल के डायरेक्टर के चरित्र और उसकी बदनामी से पूरी तरह अनजान नहीं थी। दबी जुबान में अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती थी कि डायरेक्टर साहब ने कई शिक्षिकाओं के साथ दुर्व्यवहार किया है। स्कूल का अघोषित नियम यही था— जो उनकी शर्तों पर सहमत हुई, वह उन्नति की सीढ़ियां चढ़ गई, और जिसने स्वाभिमान चुना, उसे किसी न किसी बहाने नौकरी से निकाल दिया गया।
इसका जीता-जागता सबूत थीं पिछली प्रिंसिपल नीरज मैडम । वह तलाकशुदा थीं, और अफवाहों के बाजार गर्म थे कि डायरेक्टर के दबाव में झुकने के बाद उन्हें नयी स्कूल बिल्डिंग के हॉस्टल में वार्डन बना दिया गया था। कहा जाता था कि डायरेक्टर की शामें अक्सर वहीं गुजरती थीं। अनीता के मन में भी कई बार प्रश्न उठते, लेकिन उसने यह सोचकर उन विचारों को झटक दिया, “मुझे इन सब से क्या मतलब? मैं अपने काम से काम रखूंगी।” वैसे भी, अनिता के लिए यह नौकरी केवल कुछ सीखने और समय का सदुपयोग करने का जरिया थी, कोई मजबूरी नहीं।

स्कूल में वाइस प्रिंसिपल श्रीमती फर्नाडीज थीं, जो उम्र और अनुभव में बड़ी थीं। उनकी उपस्थिति अनिता को एक सुरक्षा कवच जैसी लगती थी। फिर, जब अनिता की ही कॉलोनी में रहने वाली ‘खुराना मैडम’ प्रिंसिपल बनीं, तो अनीता की खुशी का ठिकाना न रहा। स्कूल के अंदर वे प्रिंसिपल और कोऑर्डिनेटर थीं, लेकिन गेट के बाहर आते ही वे अनिता के लिए ‘खुराना भाभी’ बन जाती थीं। प्रिंसिपल के केबिन में चाय की चुस्कियां लेते हुए दोनों कॉलेज की सहेलियों की तरह खिलखिलातीं। खुराना मैडम दूसरे शहर से थी इसलिए, डायरेक्टर साहब के बारे में कुछ विशेष जानकारी नहीं थी । अनिता ने उन्हें डायरेक्टर साहब के चरित्रगत विशेषताओं से अवगत कराया था । खुराना मैडम धीरे-धीरे स्थितियों को समझ रही थी ।
लेकिन डायरेक्टर साहब को अनिता और खुराना मैडम की यह दोस्ती और एकजुटता सख्त नाग्वार गुजरती थी। अपनी कुटिल चालों से उन्होंने दोनों का समय अलग-अलग करवा दिया। जिससे उन दोनों का साथ में आना और जाना बंद हो गया था । पर अनिता को क्या गम था? वह जब चाहे खुराना मैडम के घर जा सकती थी। अनिता ने स्कूल में खुराना मैडम से एक दूरी बनाने का दिखावा जरूर किया था ।

डायरेक्टर की नीयत का पहला संकेत तब मिला जब एक दिन अनिता हरे रंग का नया चूड़ीदार कुर्ता पहनकर स्कूल गई। डायरेक्टर ने उसे केबिन में बुलाया और कहा, “अनिता मैडम, आप पर यह ड्रेस बहुत जंच रही है।”
शब्द सामान्य थे, लेकिन कहने का अंदाज और आँखों में तैरती हवस ने अनिता को भीतर तक असहज कर दिया।
उसने प्रिंसिपल मैम से कहा, “मैम, सर का तरीका ठीक नहीं था।”
प्रिंसिपल मैम ने उसे समझाया, “अनिता, ज्यादा मत सोचो, बस चौकन्नी रहो। वह तुम्हारे साथ कुछ भी करने से पहले दस बार सोचेगा।”
इसी बीच अनिता ने एम. कॉम के एग्जाम्स के लिए छुट्टी ली । छुट्टी के बाद जब स्कूल गई तो उसका मन सशंकित था जैसे-जैसे खुराना मैडम की लीव पर जाने का समय नजदीक आ रहा था, अनिता की घबराहट बढ़ती जा रही थी ।
वक्त का पहिया घूमा और प्रिंसिपल मैम मैटरनिटी लीव पर चली गईं। फर्नाडीज मैडम भी दोपहर 2:00 बजे चली जाती थीं। अब 2 से 4 बजे तक अनिता ऑफिस में अकेली होती थी। अनिता की हंसी गायब हो गई, वह एक अनजानी आशंका से घिरी रहने लगी। घर के लैंडलाइन पर आने वाली ‘गहरी सांसों’ वाली गुमनाम कॉल्स ने उसके डर को और बढ़ा दिया था।
एक सुबह अनिता सफेद और ऑरेंज साड़ी पहनकर अपनी सीट पर बैठी थी। डायरेक्टर आया, उसे घूरा और केबिन में चला गया।
तभी इंटरकॉम बजा: “अनिता, आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं।” फोन कट गया।
पाँच मिनट बाद फिर घंटी बजी: “अनिता, अंदर आइए।”
हिम्मत जुटाकर अनिता अंदर गई। डायरेक्टर ने एक पर्ची पर कुछ लिखकर उसकी ओर बढ़ाया और कहा, “इसे पढ़कर मतलब समझाइए।”
जैसे ही अनिता ने हाथ बढ़ाया, उसने पर्ची वापस खींचकर फाड़ दी और डस्टबिन में डाल दी। यह एक मानसिक खेल था। अनिता उसकी हवस भरी निगाहों की चुभन महसूस कर पा रही थी। वह किसी तरह बहाना बनाकर बाहर आ गई।
फिर इंटरकॉम बजा। वही लिजलिजी आवाज: “अनिता… आप बला की खूबसूरत लग रही हैं…”
इस बार अनिता के सब्र का बांध टूट गया। वह गुस्से से थरथराते हुए, बिना दस्तक दिए दनदनाती हुई केबिन में घुसी। टेबल पर ऑफिस की चाबियां और फाइलें पटकते हुए वह चिल्लाई—
“यह संभालिए अपना ऑफिस! मैं अब यहाँ एक मिनट भी रुकना पसंद नहीं करूँगी।”
गुस्से और अपमान से उसका गला भर आया था। वह उसी हालत में स्कूल से निकल गई।

घर आकर वह किसी से कुछ कह न सकी। पापा तो पहले ही उसकी नौकरी के खिलाफ थे। भाइयों से कुछ कहने का मतलब था कि स्कूल डायरेक्टर से आमने-सामने की हाथापाई । अगली सुबह उसने तबीयत का बहाना बनाकर स्कूल जाने से मना कर दिया।
सुबह 10 बजे लैंडलाइन बजा। भाभी ने कहा, “स्कूल से फोन है।”
उधर से डायरेक्टर की ऊँची आवाज आई, “आप स्कूल क्यों नहीं आईं? यहाँ क्या आपकी मर्जी चलती है?” आपने सबको ” ……..” समझ रखा है । गालियों वाली भाषा सुनकर अनिता तिलमिला उठी और
तल्खी से जवाब दिया, “आपको वजह अच्छे से पता है। मैं अब कभी नहीं आऊँगी।”
डायरेक्टर ने धौंस जमाते हुए कहा, “ऐसे नहीं चलेगा। स्कूल आकर अपना हैंड ओवर कीजिए और सही तरीके से अपना इस्तीफा दीजिए।”
अनिता के भीतर न जाने कहाँ से देवी का रूप जाग उठा। उसने कहा, “ठीक है, आपकी यह इच्छा भी पूरी किए देती हूँ। 10 मिनट में मैं आ रही हूँ, तैयार रहिए।”
अनिता अपनी स्कूटी उठाकर आंधी की तरह स्कूल पहुँची। स्टाफ उसके तेवर देखकर दंग था। वह सीधे डायरेक्टर के केबिन में घुसी और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोली—
“बोलिए! अब आपको क्या तकलीफ है? क्या चाहते हैं आप?”
वही डायरेक्टर, जो अभी कुछ देर पहले तक फोन पर गुर्रा रहा था, अनिता का रौद्र रूप देखकर भीगी बिल्ली बन गया। उसके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था।
शायद उसने सोचा था कि इस तरह डरा धमका कर वह अनिता की आवाज को दबा सकता है जिससे उसकी बदनामी ना हो ।
अनिता जब अपने एम.कॉम के एग्जाम दे रही थी तो उसका डर और घबराहट देखकर शायद डायरेक्टर ने यह अंदाजा लगाया था कि “अनिता भावनात्मक रूप से बहुत ही कमजोर लड़की है । “
खिसियानी हंसी हंसते हुए डायरेक्टर बोला, “अरे अनिता मैडम, आप तो बेकार ही नाराज हो रही हैं। बैठिए न, घर पर बैठकर क्या करेंगी? ऐसा करते हैं, हमारा जो नया स्कूल है, आप उसे संभालिए। वह आपका ही है। आपको वहां का इंचार्ज बना देता हूं ।”
अनिता ने उसे घृणा से देखा और कहा, “सर, आपको अब भी लगता है कि आपका कोई भी प्रलोभन मुझे यहाँ रोक सकता है? आप जानते हैं कि मैं यह नौकरी किसी मजबूरी में नहीं कर रही। और हाँ, अभी तक मैंने अपने भाइयों को कुछ नहीं बताया है, लेकिन अगर अब…”
डायरेक्टर का चेहरा पीला पड़ गया।
अनिता ने कड़े शब्दों में कहा, “मुझे मेरी सैलरी अभी चाहिए, इसी वक्त!”
डायरेक्टर ने हकलाते हुए कहा, “जी… जी मैडम, मैं अभी रेडी करवा देता हूँ।”
सैलरी लेकर जब अनिता बाहर निकली, तो उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने डायरेक्टर की आँखों में वो ‘डर’ देख लिया था—एक ऐसा डर जो शायद अब उसे किसी और लड़की पर बुरी नजर डालने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर करेगा।
अनिता स्कूल के गेट से बाहर निकली, तो उसका सिर गर्व से ऊंचा था। अनिता जैसी इमोशनल लड़की के लिए यह करना आसान नहीं था ।वह जानती थी कि आज उसने सिर्फ अपनी लड़ाई नहीं जीती है, बल्कि एक इतिहास बदला है। उस स्कूल में अब तक डायरेक्टर की काली करतूतों के खिलाफ या तो शिक्षिकाएं डर के मारे चुप रह जाती थीं या मजबूर होकर उसकी शर्तों के आगे झुक जाती थीं। अनिता से पहले किसी भी टीचर ने डायरेक्टर को इस तरह मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत नहीं दिखाई थी, बल्कि वह चुपचाप इस्तीफा देकर स्कूल से निकल जाती थी। आज पहली बार शिकारी खुद शिकार बन गया था। डायरेक्टर की आँखों में जो खौफ अनिता ने देखा, वह इस बात का गवाह था कि अगर औरत अपनी शक्ति पहचान ले, तो बड़े से बड़ा ओहदा भी उसके स्वाभिमान के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है।
अच्छी रचना
हमारे समाज में डायरेक्टर जैसे लोगों की कमी नहीं है। जो हर स्त्री को अपनी हवस मिटाने का जरिया समझते हैं। हम अपनी बेटियों को चाहे पढ़ाई के लिए घर के बाहर भेजे या नौकरी के लिए जब तक वह सही सलामत घर वापस नहीं आ जाती है एक डर सा लगा रहता है। हमने women empowerment का नारा तो दे दिया है पर उसका सही मतलब नहीं समझ पाए है। सभी महिलाओं को अनीता बनना होगा। प्रेरणादायक रचना
सुन्दर कहानी।आज भी न केवल स्कूल में बल्कि अन्य स्थानों में भी स्त्रियों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अनिता का निर्णय साहसिक है। समाज के लिए प्रेरणादायक कहानी है।
Samaj me is tarah ke bhediye har jagh hai….anita ki tarh kai naari is tarah ki pareshani se joojhti hai…madhu ji ki is kahani se Anita jaisi naariyo ko prena milega.
Good narration, but it’s not in school’s ,the system is like this only in society especially with females, only the one who is bold n courageous will take steps, otherwise due to unconditional circumstances, it goes on in society. Naari toh Abla hai aur kamjoor……..
नारी के कई रूप हैं,पर आज की नारी को अनिता वाला रुप ही अपनाना चाहिए, वरना यह समाज के अनजान भेड़िए कुछ भी कर सकते हैं
धन्यवादजी, आपका कमेंट्स हमारी लेखिका के लिए बड़ी उपलब्धि है, इसी तरह आप उत्साहवर्धन करती रहिए.
आज की नारी को इस तरह मजबूत रहना बहुत जरुरी हे | लेखिका श्रीमती.मधू जी की शुक्र गुजार हुं की उनकी कहानी प्रेरणा दायक है 👍🙏
आप सभी का बहुत शुक्रिया, आप लोगों ने समय निकालकर मेरी रचना को पढ़ा ।
लाइवायर न्यूज़ , संपादक जी को विशेष धन्यवाद निरंतर प्रोत्साहित करने के लिए ।
हम तो यही चाहते हैं कि आपकी कलम और पैनी और धारदार हो जाए. इस मंच पर बड़े-बड़े रचनाकार हैं. आपकी रचनाएं उन तक पहुंचती है. हो सकता है समयाभाव के कारण वे टिप्पणी नहीं कर सके हों, लेकिन आप लिखती रहें. इसी तरह.. हम सभी की शुभकामानाएं आपके साथ है…