बालकनी से दिल तक…

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

शादी की 25वीं सालगिरह मनाने की तैयारियों में मैं खोई हुई थी। तभी अलमारी के कोने से एक पुराना खत हाथ लगा – और मैं यादों की गलियारों से होती हुई सीधी उन दिनों में पहुंच गई, जब मैंने पहली बार अनिल को देखा था।

पुराना घर छोड़कर जब हम नये घर में शिफ्ट हुए थे, तो सब कुछ नया था । नई बिल्डिंग, नया माहौल और नए चेहरे। उन दिनों मोबाइल का चलन नहीं था। रात के खाने के बाद सब अपने-अपने घरों से बाहर निकलते, और गली में हंसी-ठिठोली, बातों और दोस्ती का माहौल बन जाता था। इन्हीं शामों में मैंने उसे पहली बार देखा – गोरा-चिट्टा, मुस्कुराहट में शैतानी और आंखों में कुछ ऐसा आकर्षण कि नजरें ठहर सी जाती थीं। एक शाम मैं अपनी बालकनी में खड़ी थी, तभी सामने वाली बिल्डिंग की बालकनी में वही खड़ा मिला। हमारी नज़रें टकराईं… और न जाने क्यों, मैं हल्की सी मुस्कुरा कर अंदर चली गई। उस दिन के बाद हमारी नज़रें अक्सर मिलतीं – और फिर उन नजरों में ही बातों का सिलसिला चल निकला।

कभी मुस्कुराहटों में हाल-ए-दिल कहा जाता, कभी झुकती पलकों में जवाब मिल जाता। एक दिन देखा, उसके हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था। दिल बेचैन हो उठा। इशारों में मैंने पूछा – “क्या हुआ?” वो मुस्कुराया और उंगलियों के इशारे से जवाब दिया।

और उसी दिन उंगलियों की भाषा में टेलीफोन नंबरों का आदान-प्रदान भी हो गया। लैंडलाइन के उस दौर में कभी-कभी ही बात हो पाती थी। लेकिन हर एक कॉल, हर एक मुलाकात चोरी-छुपे मिलने का बहाना बन जाती थी। धीरे-धीरे एहसास प्यार में बदल गया। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था .

वो पंजाबी, और मैं गुजराती जैन।

अनिल के घर वालों को कोई एतराज़ नहीं था, लेकिन मेरे घरवालों ने तो जैसे सुनने से ही इंकार कर दिया।

बात सुलझती न देख, हमने कोर्ट में शादी कर ली और अनिल के परिवार की सहमति से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चले गए। जीवनसाथी पाने की खुशी थी, पर अपने परिवार को बिना मनाए छोड़ आने का दर्द भी उतना ही गहरा। अनिल ने हर पल मेरा साथ दिया, मेरी खामोशी को समझा, मेरे आंसूओं को मुस्कान में बदल दिया। कुछ समय बाद हम आशीर्वाद लेने मेरे घर लौटे – मगर दरवाज़े बंद रहे, और हम चुपचाप लौट आए।

वक़्त बीतता गया…

मैं अपने नए परिवार में रच-बस गई।अनिल ने मुझे प्यार से संभाला, ससुराल ने अपनाया, मगर एक कोना – जो मां-बाप की ममता से खाली था – हमेशा भीगता रहा।धीरे-धीरे वक्त ने रिश्तों के घाव भर दिए। आज मैं अपने मायके भी जाती हूं, मम्मी-पापा मुस्कुराते हैं। अब वो मुझे देखकर गर्व महसूस करते हैं।कभी-कभी सोचती हूं वो फैसला कितना मुश्किल था, पर कितना सही भी।अपने दिल की आवाज़ पर चलना आसान नहीं होता, पर शायद उसी ने मेरी जिंदगी को इस खूबसूरत मोड़ पर पहुंचाया।

आज 25 साल बाद, जब मैं और अनिल एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्कुरा रहे हैं , तो लगता है, वो नज़रों से शुरू हुई कहानी सच में मुकम्मल हो गयी।

6 thoughts on “बालकनी से दिल तक…

  1. Omg…what a romantic story…goosebumps aa gaye…sach me 25 saal pehle ki baat hi kuch aur thi na mobile na tamjam sirf ghar parivaar aur saheliya…dil ko choo gai kahani..

  2. सुखद संस्मरण, बहुत अच्छा लगा पढ़कर, खुशियाँ और सुख बाटने से पॉजिटिविटी बढ़ती है 🎉🎉👍

  3. Nice,those days were different n lively when we wait to meet friends and neighbors n enjoy life
    Now each one has no time busy on mobiles
    Jaanaey kahan gayay woh din …..!

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