कतारबद्ध खड़े ये वृक्ष… क्या आपने कभी गौर से देखा है इन्हें?
मानो अनुशासन और ध्यानमग्न तपस्या की प्रतिमूर्ति हों.
याद आता है, महिदपुर रोड के उस स्कूल का बगीचाजहाँ ये वृक्ष केवल हरियाली का प्रतीक नहीं थे, बल्कि जीवन की सहजता और सौंदर्य का विस्तार थे. पूर्णिमा की रात जब इन पर सैकड़ों झक-सफेद बगुले उतर आते और उसी रंग के फूल डालियों पर खिल उठते, तब इन वृक्षों की छटा ताजमहल की शोभा को भी मात देती थी. इन पेड़ों के नीचे की कोमल घास पर बैठकर गुज़ारी हुई साँझें आज भी स्मृतियों में ताज़ा हैं.
मिट्टी की सौंधी ख़ुश्बू किसी आधुनिक क़ॉफी हाउस की कृत्रिम सुगंध से कहीं अधिक मादक और जीवनदायी हुआ करती थी. सर्दियों की उन सुबहों में, जब बच्चे बिना स्वेटर के स्कूल पहुँचते, तो शिक्षक इन्हीं पेड़ों की छाँव और धूप के संग कक्षा लगा लिया करते.
यहीं गंभीर मुद्दों पर चर्चा भी होती, समझौते भी. आसपास युवा वॉलीबॉल और क्रिकेट खेलते. कभी बातचीत के बीच क्रिकेट की गेंद आकर गिर पड़ती तो कोई झुंझलाहट नहीं होतीहँसते हुए बच्चों को गेंद लौटा दी जाती. यह परिसर सचमुच स्वच्छ, स्वास्थ्यवर्धक और जीवंत था.
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि यह जगह केवल एक परिसर नहीं थी, बल्कि हमारे जीवन का साझा आँगन थी.जहाँ पीढ़ियों ने साथ बैठकर साँस ली, खेला, सीखा और जीया.
पर समय बदला. विकास की अंधी दौड़ में दुकानों का फैलाव हुआ, उनसे निकलने वाला कचरा इसी हरियाली पर फेंका जाने लगा. धीरे-धीरे घास की जगह पॉलीथिन की चादर बिछ गई. शौचालयों की कमी ने इस परिसर को अस्वच्छ बना दिया और वह स्थान, जो कभी सुगंध का स्रोत था, दुर्गंध का गढ़ बन गया. अब सुना है कि वहाँ बस स्टैंड का निर्माण हो रहा है. यात्री आएँगे-जाएँगे, सुविधाएँ होंगी, स्थायी शौचालय बनेंगे. परंतु इस विकास की क़ीमत हमने अपनी प्राकृतिक सुंदरता, अपनी सांझों की नीरवता और अपनी यादों के उस हरियाले आँगन से चुकाई है.
वास्तव में, यह प्रश्न अब भी मन में गूंजता है
विकास की इस चमक-दमक में कहीं खो तो नहीं गई हमारी असली खूबसूरती?
यह चित्र हमारे अजीज दोस्त अजीर्जुरहमान ने अपने अनमोल खजाने से उपलब्ध कराया है.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज, पुणे

यह प्रश्न बहुत सारी चीजों को देखकर मन में उठता है . आपने उन्हें शब्द दिया . हार्दिक बधाई.