जागरण को जी रही हूँ,याद को प्रहरी बनाकर।
आज़माना चाहती हूँ,दर्द को मैं मुस्कुराकर।।
भोर के, आसावरी के,
चेतना के छन्द लिखने।
मैं सरित की उर्मियों सँग,
प्यास के अनुबन्ध लिखने।।
अनमनी सी यामिनी को,चाँद का झाँसा दिखाकर।
चार दिन की ज़िन्दगी के,
दो जहां गुलज़ार कर लूँ।
नफ़रतों को मात देकर,
प्यार को व्यवहार कर लूँ।।
ज़िन्दगी देखे जरा अब,रौशनी से भी नहाकर।
सब्र से बैठूँ ज़माने,
मैं तुझे हैरान करने,
मुश्किलों की मुश्किलों को,
अब जरा आसान करने।।
द्वार मन के नित धरूँ मैं,दीप ‘दिव्यांशी’ जलाकर।

भारती जैन, प्रसिद्ध कवयित्री, मुरैना