भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

Read More

जागरण को जी रही हूँ…

“जागरण को जी रही हूँ, याद को प्रहरी बनाकर… मैं अब दर्द को मुस्कुराकर आज़माना चाहती हूँ। भोर की आसावरी में चेतना के छंद लिखना, सरित की लहरों के साथ प्यास के अनुबंध रचना और अनमनी यामिनी को चाँद का झाँसा दिखाना… यही अब जीवन का नया संकल्प है। चार दिन की ज़िन्दगी को प्यार से सजाना, नफ़रत को मात देना और हर मुश्किल को आसान बनाना—बस यही है मेरी नई यात्रा का उद्देश्य।”

Read More