जब काली बिल्ली ने मेरा मन पढ़ लिया

काली बिल्ली

एक रात मॉल रोड की होटल से खाना खाकर हमेशा की तरह पैदल घर जा रहा था। रिट्ज टॉकिज (शायद यही नाम है) के समीप सड़क के किनारे वाली मुंडेर पर काली बिल्ली बैठी नजर आई, उसकी पीली आंखें बिजली के छोटे बल्ब की तरह चमक रही थी। मेरी नजर उसकी नजरों से मिली, बस उसी वक्त मेरे मन में विचार आया कि बिल्ली पालना चाहिए। फिर दूसरे ही पल विचार आया कि अपन तो शिमला में अकेले रहते हैं आने-जाने का वक्त तय नहीं। बिल्ली पाल भी ली तो संभालेंगे कैसे। इस विचार ने पहले विचार को खारिज कर दिया। बिल्ली अपने और अपन अपने रास्ते चल पड़े।

घर के समीप पहुंचा तो मेरे लिए तो एकदम अकल्पनीय और आश्चर्यचकित करने वाला दृश्य था। घर की सीढ़ियों पर लोहे के दरवाजे के समीप वही काली बिल्ली इस तरह बैठी हुई थी मानो मेरे आने का इंतजार ही कर रही हो। मैं आगे बढ़ते हुए सोच रहा था कि पास पहुंचने पर वह डर कर भाग जाएगी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने सीढ़ियों वाला लोहे का छोटा दरवाजा जैसे ही खोला वह कूदती-फांदती ऊपर घर के उस दरवाजे के पास जाकर बैठ गई, जैसे जानती हो मैं इसी कमरे में रहता हूं। मुझे आते हुए इस तरह देखने लगी कि लो अब दरवाजा तो खोलो। मैंने ताला खोला, मेरे पहले वह अंदर की तरफ लपकी और उछलकर पलंग पर जाकर बैठ गई।

मैं चकित था लेकिन उसके हाव-भाव बेफिक्री वाले थे। कपड़े चेंज करने के बाद मैंने इलेक्ट्रिक सिगड़ी पर तपेली में दूध हल्का-सा गर्म किया और एक कटोरे में भरकर जैसे ही फर्श पर रखा उसने पलंग से छलांग लगाई और बेखौफ कटोरे के पास पहुंची, आंखें बंद कर दूध गटकने लगी। इस बीच में ट्रांजिस्टर ऑन करके, इलेक्ट्रिक कंबल का बटन चालू करने के साथ डबल बेड वाले कंबल की डबल घड़ी कर के हाथ-पैर में सरसों का तेल लगाने, गरम मौजे आदि पहनकर सोने की तैयारी कर चुका था। वह दूध पीने के बाद दोनों कमरों का मुआयना कर रही थी।

गले के आसपास यकायक होने लगी हल्की-सी चुभन के कारण जब मेरी नींद खुली तो चौंक गया। कब वह बिस्तर में आई और कब मेरे गले में दोनों तरफ टांगें फैलाकर सो गई पता ही नहीं चला, यदि उसके पैरों के नाखून चुभे नहीं होते तो मेरी नींद भी नहीं खुलती ।

अब रोज सुबह मेरे साथ वह भी दूध-ब्रेड का नाश्ता करती। मैं कटोरे में पानी भरकर उसे गैलरी में छोड़, कमरा बंद करके चला जाता। दोपहर को खाना खाने जाता तो एक रोटी-दाल आदि उसके लिए भी बचाकर ले आता। रात में जब पंवारजी के यहाँ खाने के लिए गया और बिल्ली वाला किस्सा बताया तो उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ। भतीजे शुभम की जिद थी मैं भी आऊँगा उसे देखने।

अगली सुबह मेरी नींद अजीब-सी दुर्गंध से खुली, लेकिन समझते देर नहीं लगी कि बिल्ली ने पेट साफ किया है। पिछले कमरे में तलाशा, पता नहीं चला। नमकीन वाला कार्टून हटाया तो एक कोने में ढेर लगा था। कागज से साफ किया। ऑफिस में रिपोर्टर पवन ढलोड़ से कहा किसी वेटरनरी डॉक्टर से बात करो। शाम को वह एक थैली में पांच किलो बालू रेती ले आया और बताया कि डॉक्टर ने कहा है घर के किसी कोने में रेत बिछा देंगे तो बिल्ली इसी जगह लेट्रिन करेगी, ऐसा ही हुआ भी।

चार-पांच दिन उससे खूब पटी। एक सुबह हम दोनों ने साथ में नाश्ता किया। तैयार होकर मैं ऑफिस जाने के लिए दरवाजा बंद करने ही वाला था कि वह लपककर बाहर आ गई, सीढ़ियों के पास पहुंच कर मुंह ऊंचा किए मुझे देख रही थी। दरवाजा खुला छोड़कर मैं इस विश्वास के साथ नीचे उतरने लगा कि वह कमरे में चले जाएगी। ऐसा हुआ नहीं, वो मुझसे पहले सीढ़ियों से नीचे उतर चुकी थी। मैं उसके पीछे गया। वह समीप वाले मकान की दरार में अंदर घुसकर अदृश्य हो गई। अब मैं मुंह उठाए उसका इंतजार कर रहा था। कुछ देर बाद मैंने उस मकान की डोर बेल बजाई, दरवाजा खुला, उनसे पूछा बिल्ली का बच्चा आया है आपके इधर, उनका कहना था नहीं कोई नहीं आया। उसके यकायक जाने से मन उदास तो हुआ पर यह मानकर संतोष कर लिया कि उसने कुछ दिन साथ रहकर बिल्ली पालने की इच्छा तो पूरी कर दी।

*शीघ्र प्रकाशित ‘किस्से कलमगिरी के’ किताब का अंश….

कीर्ति राणा
वरिष्ठ पत्रकार, कॉलमनिस्ट, इंदौर

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