आंख मारने की कला

मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जो भी इस संकेत को रिसीव करता है उसके दिल की धड़कन उस क्षण “धड़ाक” हो जाती है , जो पहले “धुक धुक धुक धुक” चल रही होती है ! यदि मेरी बातों पर विश्वास न हो तो ईसीजी करवाकर देख लीजियेगा। आँख मारने के अस्त्र को, आप उस कम दूरी की मिसाईल की तरह भी मान सकते हैं जिसका निशाना अचूक होता है ! दूरी कम इसलिए होनी चाहिए ताकि इस संकेत को भेजनेवाला और प्राप्त करनेवाला एक दूसरे की आँखों को साफ साफ देख सकें ! यह अस्त्र टारगेट को शत-प्रतिशत हिट अवश्य करता है लेकिन यह विषय अलग है कि प्राप्तकर्ता , भेजनेवाले को क्या प्रतिक्रिया देता है।

आप ज़रा विषय की गंभीरता पर विचार कीजिये कि ऐसे समय में जब कम्यूनिकेशन के नाम पर केवल चिट्ठी-पत्री रही होगी या न भी रही होगी, ऐसे समय में एक आँख को झपक कर , तुरंत दूसरे तक संकेत भेज देना कि … “आई लव यू ” …. कितना बड़ा अविष्कार था वह !…. उस महान व्यक्ति को पुनः साष्टांग दण्डवत !

आज पैंसठ की उम्र में पीछे पलटकर देखता हूँ तो खुद को कोसता हूँ … कहता हूँ अरे मूर्ख जब तेरे पास इतने उन्नत किस्म का अस्त्र था तो तू ने अपनी जवानी में इसका प्रयोग क्यूँ नहीं किया ? मात्र थोड़ी सी प्रेक्टिस कर लेता , एक आँख को खोले हुए एक को खटाक से बंद कर लेता तो तेरा क्या बिगड़ जाता ? … अब पछताए का होत है जब चिड़िया चुग गई खेत !!!

दोस्तों , अब चालू करता हूँ राज़ की बात ! इसके पहले कि सारी बात बताऊँ , एक बार फिर से उस शख़्स को प्रणाम। मैं इस शस्त्र का उपयोग अभी भी बखूबी करता हूँ ! नीता जब सजी संवरी अन्य लोगों के साथ बैठी रहती है तो मैं सटाक से यह अस्त्र उसपर चला देता हूँ ! वह शर्म से कसमसाने लगती है, अपनी मुस्कान को छिपाने की कोशिश करती है ! कभी कभी आँखों से गुस्सा दिखाती है कि सबके सामने ऐसा मत करिये , कोई देख लेगा तो ? … यह अस्त्र अभी भी ज़बर्जस्त काम करता है , आपकी सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं !

इस अस्त्र का प्रयोग मैं अक्सर अपने डेंटिस्ट की क्लिनिक में करता हूँ जब या तो नीता या मेरा दांतों का ट्रीटमेंट चलता रहता है। डेंटल क्लिनिक में मरीज़ की कुर्सी में बैठना ही आधी जान निकाल देता है। जब नीता उसपर बैठती है तो मैं सामने खड़े खड़े उसपर अँखियों का यह अस्त्र चला देता हूँ ! वह उस अवस्था में भी मुस्कुरा देती है ! इस तरह प्यार का संदेश भेजकर मैं उसका ध्यान बंटा देता हूँ , उसका दर्द अवश्य कुछ कम हो जाता है ! … और जब मैं मरीज़ की कुर्सी में होता हूँ तो पास खड़ी नीता का डरा चेहरा देखता हूँ , वह मेरे लिए डरी होती है , ऐसे में मैं डॉक्टर से ऑंखें बचाकर नीता पर यह बाण चला देता हूँ ताकि वह मेरे लिए न डरे !

कल शाम को क्लिनिक में मेरा एक दांत उखाड़ा गया। शायद नीता ने मेरा खून देख लिया। घर आकर मुझे अपनी गोद में लिटा लिया , बाल सहलाने लगी। उसकी आगोश में बड़ी शांति मिलती है। मैं विचार करने लगा कि बिना एक के दूसरे का जीवन कैसा हो जायेगा ? मैं अपने फेसबुक के उन मित्रों को याद करने लगा जो अब इस दुनिया में बिना अपने जीवन साथी के हैं ! एकाकी जीवन कितना कष्टप्रद होता होगा ? उनकी विरह ज्वाला स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। मेरी उम्र के उन सभी दोस्तों को सलाह देना चाहता हूँ कि अपने जीवन साथी के साथ प्यार में ओतप्रोत हो जाएँ , पता नहीं , एक दूसरे के साथ साथ का यह जीवन कब वीरानें में बदल जाये ?

अनुपम नीता बरडे,
प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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