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 उबंटू

स्कूल में बच्चे अपना टिफिन मिल-बाँटकर खाते हुए। जब खुशियाँ बाँटी जाती हैं, तो हर किसी का टिफिन भर जाता है।

शालिनी वर्मा, दोहा (कतर)

टन टन टन टन…

स्कूल की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बज रही थी और घंटी की आवाज़ कक्षा में बैठे सभी बच्चों के कानों से होकर सीधे दिल में उतर रही थी। एक क्लास के बाद घंटी बजने पर बच्चों को जो अनुभव होता है, उसे तो बस कक्षा में बैठने वाला बच्चा ही जान सकता है।

सारे बच्चे घंटी बजते ही उठने लगे। कोई हाथ धोने बाहर जा रहा था, तो कोई खेल के मैदान में। वे सब जैसे जो भी करना चाहते थे, उसे इसी रेसस टाइम में पूरा कर लेना चाहते थे। बच्चों की दुनिया किताब-कॉपी और खेल के इर्द-गिर्द ही होती है।

मायरा! मायरा!

रिंकी ने अपनी सबसे अच्छी दोस्त मायरा को मुड़कर पुकारा।

मायरा ने कुछ उदास नज़रों से उसे देखा, जैसे कह रही हो, मुझे अनदेखा कर दो।

बाकी बच्चे मेज़ों पर बैठकर अपने-अपने लंच बॉक्स खोल रहे थे। पीछे की तरफ हँसी-मज़ाक चल रहा था।

सना: देखो! आज मम्मी ने मेरे लिए आलू के पराठे बनाए हैं!

अंकुश: वाह! मैं तो पास्ता लाया हूँ। कौन खाएगा?

मायरा चुपचाप अपना बैग टटोलती है और उदास हो जाती है।

कमरे में खाने की खुशबू फैलने लगती है। टिफिन के खुलने की आवाज़ें ही बस मायरा को सुनाई दे रही थीं।

मायरा मन ही मन कल्पना करती है, जैसे वह आलू का पराठा खा रही हो। सच में, आलू से अच्छी तरह भरे पराठे कितने स्वादिष्ट लगते हैं! और पास्ता, वह भी कैसे मुँह में घुल जाता है!

नितिन: अरे मायरा, तुम खाना नहीं खा रही?

मायरा (धीमे और दुखी स्वर में): न… नहीं। मेरा तो पेट भरा हुआ है। आज मम्मी ने खूब नाश्ता करवा दिया था।

उसकी आँखों के सामने सुबह घर में हुई उठापटक का दृश्य घूमने लगा।

“मैं ही क्यों खाना बनाऊँ? तुम भी कभी माँ की मदद कर दिया करो।” माँ की तीखी आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी।

“छोटा बच्चा पूरी रात जगाता है।”

पापा उतनी ही तीखी आवाज़ में बोले, “पैसे दे रहा हूँ, कैंटीन से खा लेगी।”

रिंकी: पर लाई क्या हो टिफिन में आज?

रिंकी की आवाज़ से मायरा वापस कक्षा की दुनिया में लौट आई।

मायरा: अरे! आज घर पर लंच बॉक्स रह गया…

कक्षा में थोड़ी चुप्पी-सी छा जाती है।

रिंकी को यह जानकर दुख हुआ कि मायरा टिफिन भूल गई है।

दूसरे बच्चे एक-दूसरे को देखने लगे। तभी रिंकी उठकर धीरे से अपना लंच मायरा के सामने रख देती है।

मायरा: नहीं रिंकी, मैं तुम्हारा खाना कैसे ले सकती हूँ?

रिंकी: क्यों नहीं? मैंने सुना है, खाना बाँटने से कम थोड़ी होता है!

नितिन (मुस्कुराते हुए): हमारा खाना तभी पूरा होगा, जब हम सब एक साथ खाएँगे। तुम्हें पता है, उबंटू!

सब बच्चे: उबंटू! मतलब?

नितिन: हाँ, उबंटू! इसका मतलब है, ‘हम तभी खुश होते हैं, जब हमारे आस-पास सब खुश हों।’

(सभी बच्चे अपने-अपने लंच बॉक्स से थोड़ा-थोड़ा खाना मायरा के सामने रख देते हैं। धीरे-धीरे मेज़ पर एक बड़ा ‘ओबेंटो’ जैसा लंच तैयार हो जाता है।)

अंकुश: आज तो सबसे बड़ा ओबेंटो (जापानी लंच बॉक्स) बन गया!

मायरा (आँखों में चमक के साथ): सोचा था, आज कैसे खाऊँगी… पर तुम सबने मेरा दिन खुशियों से भर दिया।

रिंकी: यही तो दोस्ती है, यही है उबंटू!

सब बच्चे साथ बैठकर हँसते हुए खाना खाते हैं। तभी शालिनी मेम प्रवेश करती हैं और उन्हें साथ देखकर बहुत प्रसन्न होती हैं।

शालिनी मेम: बच्चों, मैंने बाहर से आपकी बातें सुनीं। आप सभी का दिल बहुत बड़ा है। किसी के साथ खाना बाँटना सबसे बड़ा पुण्य है। तुमने आज दिखाया कि साझा करने से दिल जुड़ते हैं। यही उबंटू की आत्मा है।

सारे बच्चे: उबंटू!

शालिनी मेम: बच्चों, आपको पता है, उबंटू एक अफ्रीकी दर्शन है, जो मानवता, सह-अस्तित्व और सामूहिकता की भावना को दर्शाता है। इसके केंद्र में एक बहुत ही सुंदर विचार है: मैं हूँ क्योंकि हम हैं। I am because we are. उबंटू का मूल भाव कहता है कि हर व्यक्ति की मानवता दूसरे व्यक्ति की मानवता से जुड़ी हुई है।

सारे बच्चे: “मैं हूँ क्योंकि हम हैं।”

(बच्चे हाथ पकड़कर खड़े हो जाते हैं।)

सभी बच्चे: हम साथ रहेंगे… हम उबंटू बनेंगे!

सब खिलखिलाकर हँसते हैं और उनके साथ शालिनी मेम भी।

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