
वर्षा गर्ग
ट्रेन में सफ़र करते हुए आसपास के लोगों पर नज़रें दौड़ाईं, सभी अपने-अपने मोबाइल में गुम दिखाई दिए।
हर दस-बीस मिनट में पेंट्री वाले कुछ न कुछ लिए चले आ रहे हैं। बिस्किट, वेफर्स, कोल्ड ड्रिंक, चाय-कॉफी, सैंडविच, कटलेट, पोहा या अंडा बिरयानी। इतने आइटम्स और खाना-पीना भूख बढ़ाने के बजाय खाने के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर रहा है।
इन लोगों की आवाज़ों और एसी ट्रेन में फैलती खाने की तेज़ महक मुझे बार-बार विचलित करते हुए पुराने दिनों में लिए जा रही है।
मन में अमिट छाप है कुछ पुरानी यादों की।
उन्हीं में से एक है आलू-पूरी से जुड़ी यादें।
बचपन में उज्जैन से अपने ननिहाल दिल्ली जाने के दौरान उबले आलुओं की चटपटी सब्ज़ी और नरम पूरियों संग आम के अचार का ज़िक्र आज भी मुँह में पानी ले आता है।
इस परंपरा को मैंने अपनी शादी हो जाने के बाद भी कई सालों तक मुंबई से खंडवा यात्रा के दौरान निभाया। बच्चे भी इतने शौक से खाते थे कि कभी लंबे समय तक कोई प्रवास न हो, तो कहते थे, मम्मी! आज घर पर ही ट्रेन का खाना बनाओ ना।
तब स्लीपर क्लास में चलने वाले मध्यम वर्ग के लिए आरक्षित सीटें ही बहुत बड़ा वरदान होती थीं। घर से ही मिठाई के पुराने डिब्बों में सब्ज़ी-पूरी पैक की जाती, ताकि खाने के बाद डिब्बे फेंके जा सकें। एक अख़बार अनिवार्य रूप से साथ रखा जाता, क्योंकि तब तक डिस्पोजेबल ने दस्तक नहीं दी थी।
घर में बहुत संभालकर रखी हुई सेलो या मिल्टन की ठंडी बॉटल अच्छी तरह साफ़ करके भरी जाती। तब स्टेशनों पर बोतलबंद पानी भी कहाँ होता था?
स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही भुनी मूँगफली, चने, मौसमी फल या उबले चनों की चाट लेकर आने वालों की लाइन लग जाती।
चाट में डाले गए मसालों और कच्चे प्याज़, टमाटर, हरे धनिये की खुशबू सभी की भूख बढ़ा देती और फिर करीब-करीब हर सीट पर पत्तों के दोने नज़र आने लगते थे।
बड़ा स्टेशन आने पर घर का कोई समझदार सदस्य (जो अक्सर पापा ही होते थे) नीचे उतरकर चाय खरीदता और फिर ट्रेन की खिड़की से सबको कप पकड़ाए जाते।
उसी दौरान बुज़ुर्ग दिखाई देते, कोई अंकल-आंटी अपनी बोतल पकड़ाते हुए उसे भर लाने का आदेश देते। जिसे सुनकर घर के अन्य सदस्य उन्हें जल्दी ऊपर चढ़ने का आदेश दिया करते। हमें तो एक बार ट्रेन में बैठ जाने के बाद नीचे उतरने की भी सख़्त मनाही होती थी।
हम अपने साथ कोई बाल पत्रिका लेकर चलते, जो जल्दी ही पूरी पढ़ ली जाती। फिर कंपार्टमेंट में किताबों और अख़बारों की अदला-बदली का दौर चला करता।
कभी-कभी ये दोस्ती एक-दूसरे को अपना खाना खिलाने के बाद पते नोट करने तक जारी रहती। कुछ दिनों तक पोस्टकार्ड भी भेजे जाते।
रेलयात्रा के दौरान मिलने वाले समोसे, कचौरी हम ललचाई नज़रों से देखते ज़रूर थे, मगर कभी खाने को नहीं मिले।
ज़्यादा ज़िद करने पर पापा पारले ग्लूकोज़ बिस्किट या संतरे ले आते और सभी को दे देते।
सहयात्रियों से बातें करते, अंताक्षरी खेलते दस-बारह घंटे आराम से बीत जाते। इस समय तक इंजन का कोयला कपड़ों और चेहरे पर अपनी छाप छोड़ जाता।
रात के लिए होल्डॉल खोलकर बिस्तर बिछाए जाते और खुद को महाराजा समझते हुए हम अपने तकियों में हवा भरने लगते।
जिनके पास तकिए नहीं होते, वे हसरत भरी निगाहों से देखते रहते।
सुबह होते ही तकियों की हवा निकाली जाती, चादर तह करके वापस बैग में रखते हुए सेलो की बॉटल में बचा पानी खिड़की में मुँह धोने में प्रयोग किया जाता।
अब हम दिल्ली स्टेशन पर उतरने की तैयारी में होते। उतरते हुए अपनी पत्रिका, अख़बार समेटना भी नहीं भूलते।
पूरी बोगी में सिर्फ़ मूँगफली या संतरे के छिलके दिखाई देते थे। जिन्हें अपनी शर्ट से साफ़ करते बच्चे छुट्टे पैसों के लालच में यात्रियों के आगे हाथ फैलाया करते थे।
आज पूर्णतया वातानुकूलित ट्रेन में चलते हुए, हर सुविधा से लैस रहते हुए भी सफ़र का वह निर्मल आनंद नहीं मिलता।
सुविधाओं के आदी होते हुए, स्लीपर से सेकेंड एसी या कभी-कभी फर्स्ट क्लास में घूमते हुए भी अब वो सुख क्यों नहीं मिलता… सोचिएगा कभी।
पहले अभाव में जीते हुए कुछ भी मिल जाना बहुत बड़ी सौगात हुआ करता था। अब गले तक अघाए हुए हम सभी को कोई भी बात ख़ुश नहीं करती।
