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पुरानी रेल यात्रा में भारतीय परिवार घर से लाई आलू-पूरी खाते हुए

याद न जाए बीते दिनों की!

कभी रेल यात्रा का मतलब था घर से बँधी आलू-पूरी, अख़बार में परोसी चाट, खिड़की से मिलती चाय और अनजान सहयात्रियों से बनती दोस्ती। आज सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन क्या सफ़र का वह अपनापन कहीं पीछे छूट गया है? बीते दिनों की यादों में डूबा एक आत्मीय संस्मरण।

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बस बारह घंटे

दिल्ली से पटना की बारह घंटे की रेल यात्रा में पनपा किशोर प्रेम समाज और संस्कारों की दीवार से टकराकर दबा दिया जाता है, पर उसका मीठा दर्द शेफाली के जीवन भर उसके साथ रहता है।

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