
प्रस्तुति-सुरेश परिहार (कीर्ति राणा की पुस्तक “किस्से कलमगिरी के” से)
यह कहानी एक ऐसे जांबाज पत्रकार की है, जिसने अपनी पत्रकारिता में कामरेडी अंदाज कभी नही छोड़ा.. वह इंदौर का कल का मुन्ना..आज शहर नहीं देश का एक अच्छे पत्रकारों में शुमार है यह कहानी उसी की जुबानी है. मुन्ना कैसे पत्रकार कीर्ति राणा बना. घटना, देशकाल वातावरण सभी उन्हीं की पुस्तक किस्से कलमगिरी से लिए गए हैं. (कीर्ति राणा की किताब किस्से कलमगिरी के पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी. ऐसा मेरा विश्वास है)
पुस्तक का यह संपादित अंश है. पूरा आर्टिकल किस्से कलमगिरी के में है.
सिटी डेस्क की कमान, नई काइनेटिक और दंगों के बीच श्रीराम का सहारा
भास्कर इंदौर की रीजनल डेस्क पर कामकाज ठीक-ठाक चल रहा था. ग्रामीण संवाददाता भी मुझे रीजनल इंचार्ज बनाए जाने से खुश थे. इसी दौरान प्रधान संपादक यतींद्र भटनागर विवादों में घिरे और प्रबंधन ने उनसे अलग होने का निर्णय लिया. बाद में श्रवण गर्ग जी के पास इंदौर महानगर जैसे विशेष पेज की जिम्मेदारी आई. काम बढ़ने पर मुझे रीजनल डेस्क से हटाकर इस पेज का दायित्व सौंप दिया गया.
इसी बीच सिटी इंचार्ज विनय लाखे विवादों में घिर गए. अग्रवाल शब्द के कथित आपत्तिजनक संधि-विच्छेद और पाटीदार नर्सिंग होम से जुड़े रिश्वतखोरी तथा ब्लैकमेलिंग के आरोपों ने मामला गंभीर बना दिया. वरिष्ठ पत्रकार विनय तिवारी ने इस प्रकरण में सबूत जुटाकर प्रबंधन तक पहुंचाए. जांच के बाद लाखे जी को भास्कर से विदा होना पड़ा.
एक दिन श्रवण गर्ग जी का संदेश मिला कि तुरंत दफ्तर पहुंचिए. उन्होंने कहा, अब विनय लाखे सिटी में नहीं हैं. आज से आप इंचार्ज की हैसियत से काम संभालिए. पहले डीआईजी वी.के. अग्निहोत्री का इंटरव्यू करके आइए.
पुराने स्कूटर से इंटरव्यू करने पहुंचा और शाम से सिटी डेस्क की नई पारी शुरू हो गई. स्कूटर की परेशानियां बताने पर कुछ ही दिनों में कार्यालय ने नई काइनेटिक होंडा लेने के लिए कह दिया. मेरे लिए यह सपनों की गाड़ी थी. कम हाइट के कारण पुराने स्कूटर पर बैठे-बैठे किक लगाना मुश्किल होता था, जबकि नई गाड़ी स्विच दबाते ही स्टार्ट हो जाती थी.
नई गाड़ी घर पहुंची, तो पूरी गवाड़ी में मिठाई बांटी गई. इससे अखबार के काम में तेजी आई. सामाजिक कार्यक्रमों, विवाह समारोहों और शोकसभाओं में पहुंचना आसान हो गया. सुबह बच्चों को मंदिर ले जाना, स्कूल बस में बैठाना और दिनभर पत्रकारिता की जिम्मेदारियां निभाना मेरी दिनचर्या बन गई थी.
दंगों के बीच गाड़ी पर लगा श्रीराम का स्टीकर
बात संभवतः 1989 की है. इंदौर में ईद मिलादुन्नबी के जुलूस के दौरान सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया. मैंने प्रशासन को पहले ही संभावित खतरे के प्रति आगाह किया था. इसके बावजूद जुलूस निकला और शहर के कई हिस्सों में हिंसा फैल गई.
मैं जनसंपर्क विभाग के तत्कालीन उपसंचालक लाजपत आहुजा के साथ पुलिस कंट्रोल रूम पहुंचा. वहां से अधिकारियों का काफिला प्रभावित इलाकों की ओर रवाना हुआ. जवाहर मार्ग पर पत्थर, टूटी बोतलें और जले हुए वाहनों के बीच तनावपूर्ण माहौल था. पुलिस ने उपद्रवियों को तितर-बितर करने के लिए हवाई फायर किए. इसी दौरान चली एक गोली आहुजा जी और मेरे बीच से निकल गई. हम दोनों सहम गए और वहां से लौटने का फैसला किया.
मेरी काइनेटिक लोहारपट्टी में खड़ी थी. कर्फ्यू लग चुका था, फिर भी मैं किसी तरह गाड़ी तक पहुंचा. दोनों पहियों की हवा निकली हुई थी. मुझे लगा, शायद गाड़ी पर लगा श्रीराम का स्टीकर ही परेशानी की वजह बना हो. फिर भी मन ने यही कहकर संतोष किया कि श्रीराम ने गाड़ी बचा ली.
पंचर गाड़ी को खींचते हुए सुनसान सड़कों से घर लौटना आसान नहीं था. इमली बाजार में एक साइकिल दुकानदार की मिन्नत करके पहियों में हवा भरवाई. दंगे की खबर से घरवाले चिंतित थे. मोबाइल का जमाना नहीं था और फोन की दुकानें भी बंद हो चुकी थीं. घर पहुंचा, तब सबने राहत की सांस ली. इसी काइनेटिक से जुड़ा एक और प्रसंग याद आता है. मानपुर में महिलाओं ने शराबखोर पतियों की आदत छुड़ाने के लिए उन्हें झाड़ुओं से सबक सिखाने का फैसला किया था. खबर करने के लिए रमण घोष को भेजा, लेकिन बस नहीं मिली. खबर उसी दिन करना जरूरी था, इसलिए मैं उन्हें स्कूटर से मानपुर ले गया. दोपहर तक लौट आए और इस बाइलाइन स्टोरी के लिए प्रबंधन ने भी तारीफ की.
पत्रकारिता के उन दिनों में नई गाड़ी केवल आने-जाने का साधन नहीं थी. वह मेरी पेशेवर जिम्मेदारियों, सामाजिक सक्रियता और जोखिम भरे अनुभवों की साथी बन गई थी.

किस्से कलमगिरी के पुस्तक के मूल लेखक कीर्ति राणा (वरिष्ठ पत्रकार, इंदौर)
