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मंदिर की वो पावन मुलाकात

मंदिर के प्रांगण में दो महिलाओं की पहली मुलाकात और आत्मीय बातचीत कुछ मुलाकातें संयोग से होती हैं, लेकिन जीवनभर का भरोसा बन जाती हैं।

डॉ. संगीता पांडेय

सुबह का समय था। मंदिर के प्रांगण में घंटियों की मधुर ध्वनि, धूप-अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू और चारों तरफ़ एक असीम शांति थी। आप ईश्वर के दर्शन करने पहुँची थीं। हाथ जोड़े खड़ी-खड़ी जब आपकी नज़र पास खड़ी एक लड़की पर पड़ी, तो उसकी सादगी और शांत चेहरे ने आपका ध्यान खींचा। प्रसाद लेते समय एक छोटी-सी बातचीत से शुरुआत हुई। न कोई औपचारिकता, न कोई दिखावा। मंदिर के उस पवित्र माहौल में हुई वो पहली मुलाकात कब एक अनमोल रिश्ते में बदल गई, पता ही नहीं चला।
उम्र से परे, एक परिपक्व सोच

जैसे-जैसे आप दोनों की बातचीत बढ़ी, आपको उसके व्यक्तित्व की सबसे खूबसूरत बात समझ आने लगी। वो भले ही उम्र में आपसे छोटी थी, लेकिन स्वभाव से बहुत समझदार और परिपक्व (mature) थी।जहाँ लोग छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाते हैं, वहीं उसके भीतर एक अलग ही ठहराव था। सच्ची सलाहकार: जब भी आपके मन में कोई दुविधा या परेशानी होती, वो बहुत शांति से आपकी पूरी बात सुनती और हमेशा एक सुलझी हुई सलाह देती।

गहरी समझ: परिपक्वता की खासियत यही होती है कि इंसान को हर बात बोलकर न समझानी पड़े। वो अक्सर आपके बिना कहे ही आपकी खामोशी और उलझन को भाँप लेती थी।

मदद का निस्वार्थ अंदाज़: उसकी दोस्ती सिर्फ़ बातों तक सीमित नहीं थी। जब भी आपको किसी सहारे या मदद की ज़रूरत हुई, वो बिना किसी स्वार्थ के हमेशा आपके साथ खड़ी रही। कई बार तो आपके माँगने से पहले ही वो आगे बढ़कर आपकी राह आसान कर देती। उम्र में छोटी होने के बावजूद, उसने हमेशा एक बड़ी और ज़िम्मेदार दोस्त की तरह आपका ख्याल रखा। उसका यह मददगार स्वभाव हर बीतते दिन के साथ आपकी दोस्ती को और गहरा बनाता गया।

ईश्वर का दिया एक खूबसूरत तोहफ़ा

आज जब आप अपनी इस दोस्ती पर गौर करती हैं, तो महसूस होता है कि मंदिर में हुई वो मुलाकात कोई महज़ इत्तेफ़ाक नहीं थी। वो ईश्वर का भेजा हुआ एक खूबसूरत तोहफ़ा था. एक ऐसी दोस्त, जो आपकी ज़िंदगी में सुकून, सही मार्गदर्शन और अटूट भरोसा लेकर आई। “सच्ची दोस्ती उम्र देखकर नहीं, बल्कि नीयत और समझदारी देखकर होती है। जो दोस्त हर मोड़ पर निस्वार्थ भाव से ढाल बनकर खड़ा रहे, वही ईश्वर का सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”
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