एक ही घर, दो थालियां: क्या ऐसे बच सकता है रिश्ता?

सुरेेेश परिहार, पुणे
आज खाने में क्या बनाएं?सवाल छोटा है, लेकिन कई घरों में इसका जवाब मिलने तक अच्छी-खासी बहस हो जाती है.कुछ हल्का बनाते हैं…नहीं, आज कुछ अच्छा खाने का मन है .मैं डाइट पर हूं .तो तुम अपना खा लो, मैं अपना बना लूंगा.और यहीं से शुरू होती है रिश्तों की एक नई कहानी…..
साथ रहेंगे, लेकिन हर दिन एक ही खाना खाने की मजबूरी नहीं होगी.इसी सोच को इन दिनों ‘फूड डिवोर्स’ कहा जा रहा है. नाम भले ही थोड़ा चौंकाने वाला हो, लेकिन इसका मतलब तलाक या रिश्ते में दूरी बिल्कुल नहीं है. इसका सीधा अर्थ है कि पति-पत्नी या पार्टनर खाने के मामले में अपनी-अपनी पसंद, जरूरत और समय के अनुसार फैसला लेते हैं.
एक को बिरयानी, दूसरे को सलाद !
कल्पना कीजिए, पति जिम से लौटकर प्रोटीन से भरपूर भोजन करना चाहता है, जबकि पत्नी को उस दिन गरमागरम पराठे और सब्जी खाने का मन है. या पत्नी शाम को जल्दी खाना चाहती है, जबकि पति की बैठक देर रात तक चलती है. पहले ऐसे मामलों में किसी एक को समझौता करना पड़ता था. अब कुछ कपल्स कहते हैं तुम्हें जो पसंद है, वह खाओ. मुझे जो पसंद है, मैं खाऊंगा.एक रोटी-सब्जी खा सकता है, दूसरा नूडल्स. एक घर का खाना बना सकता है, दूसरा बाहर से अपना भोजन मंगा सकता है. यहां तक कि दोनों अलग-अलग समय पर भी खाना खा सकते हैं.यानी रिश्ता एक है, लेकिन थाली अलग हो सकती है.
असली लड़ाई खाने की नहीं होती
दिलचस्प बात यह है कि कई बार पति-पत्नी की बहस वास्तव में खाने को लेकर होती ही नहीं.आज क्या बनाऊं? के पीछे सवाल हो सकता है. हर बार मैं ही क्यों सोचूं? तुम्हें मेरा खाना पसंद नहीं? के पीछे छिपी भावना हो सकती है क्या मेरी पसंद की कोई अहमियत नहीं? और तुम जो खाना है खा लो कभी-कभी यह भी कह सकता हैमैं रोज-रोज इस बात पर बहस नहीं करना चाहता .रिलेशनशिप विशेषज्ञों के अनुसार, जब खाने को लेकर एक ही तरह की बहस बार-बार होती है, तो उसके पीछे पसंद, स्वतंत्रता, नियंत्रण या एक-दूसरे की जरूरतों को लेकर असंतोष भी हो सकता है.
फूड डिवोर्स का एक फायदा यह भी!
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा शायद यह है कि खाने को लेकर होने वाली रोज की छोटी-छोटी तकरार खत्म हो सकती है .किसे क्या पसंद है, किसे कितनी मात्रा चाहिए, किस समय खाना है.हर बात पर सहमति जरूरी नहीं रह जाती. आज पति को पिज्जा खाना है तो वह पिज्जा खा सकता है. पत्नी को दाल-चावल चाहिए तो वह दाल-चावल खा सकती है.और सबसे महत्वपूर्ण बात…किसी को दूसरे की पसंद को गलत साबित करने की जरूरत नहीं. लेकिन एक खतरा भी है…यहां कहानी का दूसरा पहलू भी है . अगर अलग खाना सिर्फ इसलिए है कि दोनों की पसंद अलग है, काम का समय अलग है या डाइट अलग है, तो इसमें कोई बड़ी परेशानी नहीं .लेकिन अगर अलग खाना धीरे-धीरे अलग रहना बन जाए तो? पहले अलग खाना, फिर अलग कमरे में बैठना, फिर बातचीत कम होना और आखिर में एक-दूसरे के साथ समय बिताने की इच्छा भी खत्म हो जाना तब मामला सिर्फ भोजन का नहीं रह जाता. इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि अलग खाना तभी ठीक है, जब भावनात्मक जुड़ाव बना रहे. साथ खाना जरूरी नहीं, लेकिन साथ होना जरूरी है.
तो क्या एक ही प्लेट में प्यार होता है?
जरूरी नहीं. कई भारतीय परिवारों में साथ बैठकर खाना प्यार और अपनापन जताने का तरीका रहा है. लेकिन बदलती जीवनशैली में हर व्यक्ति की डाइट, काम का समय और खाने की पसंद अलग हो सकती है.ऐसे में प्यार की परीक्षा यह नहीं होनी चाहिए कि दोनों ने एक ही सब्जी खाई या नहीं. कभी पति अपनी पसंद का खाना खा सकता है और पत्नी अपनी पसंद का. लेकिन रात में दोनों साथ चाय पी सकते हैं.
सप्ताहांत में साथ खाना बना सकते हैं. महीने में एक बार बाहर डिनर कर सकते हैं. या सिर्फ १५ मिनट बैठकर दिनभर की बातें कर सकते हैं.क्योंकि रिश्ते को जोड़ने का काम सिर्फ खाना नहीं करता, बातचीत और अपनापन भी करते हैं.
फूड डिवोर्स का असली मतलब
शायद फूड डिवोर्स को समझने का सबसे आसान तरीका यही है. थाली अलग हो सकती है, लेकिन रिश्ता नहीं.हर बात में एक जैसा होना जरूरी नहीं. कभी-कभी एक-दूसरे को अपनी पसंद के अनुसार जीने की जगह देना ही रिश्ते में तनाव कम करता है.
आखिर खुशहाल रिश्ते में सवाल यह नहीं कि हम दोनों ने क्या खाया? सवाल यह है कि क्या हमने एक-दूसरे की पसंद का सम्मान किया?और अगर इसका जवाब हां है, तो एक ही घर में दो अलग थालियां भी रिश्ते की खूबसूरती को कम नहीं करतीं.

जय हो 🙏