
डॉ. शशिकला पटेल, मुंबई
मूल कथानक, घटनाक्रम, संवाद और भाव को यथासंभव जस का तस रखते हुए केवल वर्तनी, व्याकरण, विराम-चिह्न, वाक्य-विन्यास और कुछ स्पष्ट भाषाई त्रुटियाँ सुधारी हैं।
अतीत की परछाइयाँ
डॉ. शशिकला पटेल
रात कालिमा बनकर चारों ओर पसर चुकी थी। पहाड़ों के बीच से गुजरती ठंडी हवा किसी अनजाने भय की तरह सीटी बजा रही थी। दूर कहीं पैरों की आहट सुनाई दे रही थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि पत्तों की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी।
अचानक बिजली कड़की।
उस क्षणिक उजाले में एक भयावह दृश्य दिखाई दिया।
एक व्यक्ति छुपते-छुपाते एक दस वर्षीय बच्चे को लेकर ऊँचे पहाड़ की ओर बढ़ रहा था। बच्चे के हाथ बँधे थे और मुँह पर कपड़ा कसकर बाँधा गया था। वह बेचारा छटपटा रहा था, लेकिन तेज बारिश और गरजते बादलों के बीच उसकी आवाज दबकर रह गई थी।
बिजली फिर चमकी।
बच्चे की डरी हुई आँखें दिखाई दीं।
वह था, सोहम।
“सोहम…!”
सोनिया चीखते हुए नींद से उठ बैठी।
उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। उसने घबराकर इधर-उधर देखा।
“सोहम… सोहम, कहाँ हो तुम?”
उसने तुरंत अपने बेटे के बिस्तर की ओर देखा।
बिस्तर खाली था।
सोनिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“नहीं…! अभी तो यहीं सो रहा था।”
उसने तुरंत लाइट जलाई और एक-एक करके सभी कमरे देखने लगी।
“सोहम… बेटा… कहाँ हो?”
बाथरूम खाली था।
बरामदा खाली था।
रसोई खाली थी।
बगीचे का दरवाजा भी खुला हुआ था।
सोनिया की साँसें तेज हो गईं।
“हे भगवान! मेरा बच्चा कहाँ चला गया?”
वह दौड़ती हुई अपने पति सुनील के पास पहुँची और उसे झकझोरते हुए बोली—
“सुनील, उठो! जल्दी उठो!”
सुनील हड़बड़ाकर उठा।
“क्या हुआ, सोनिया?”
“सोहम… सोहम घर में नहीं है!”
“क्या?”
“मैंने पूरा घर छान मारा। वह कहीं नहीं मिल रहा।”
सुनील तुरंत उठ खड़ा हुआ।
“सोहम!”
उसने पूरे घर में आवाज लगाई—
“सोहम… बेटा… कहाँ हो?”
लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
सोनिया रोते हुए बोली—
“मैं तो उसे कहीं अकेले नहीं जाने देती। तुम जानते हो, वह अँधेरे से कितना डरता है।”
फिर अचानक वह गुस्से में बोली—
“ये भोला और मालती भी न जाने क्या कर रहे थे! किसी ने ध्यान क्यों नहीं रखा?”
सुनील ने उसे शांत करने की कोशिश की।
“सोनिया, अभी किसी को दोष देने का समय नहीं है। पहले सोचो, सोहम कहाँ जा सकता है?”
“वह कहीं नहीं जा सकता, सुनील!” सोनिया लगभग चीख पड़ी। “वह घर से बाहर कभी अकेले नहीं गया।”
दोनों ने पूरी रात सोहम को खोजा।
पड़ोसियों से पूछा।
दोस्तों के घर गए।
आसपास की गलियों में तलाश की।
लेकिन रात बीत गई और सोहम का कोई पता नहीं चला।
सुबह होते ही सोनिया की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
वह सुनील का हाथ पकड़कर बोली—
“कुछ भी करो, मेरे बेटे को ढूँढ़कर लाओ। उसके बिना मैं नहीं जी सकती।”
सुनील ने उसे संभालते हुए कहा—
“मैं उसे ढूँढ़कर लाऊँगा। चाहे मुझे पूरी दुनिया क्यों न छाननी पड़े।”
दोनों तुरंत पुलिस स्टेशन पहुँचे।
इंस्पेक्टर चतुर सिंह अपने कमरे में बैठकर कुछ फाइलें देख रहे थे।
सुनील बेचैनी से उनके सामने पहुँचा।
“इंस्पेक्टर साहब, मेरा बेटा गायब हो गया है। कृपया उसे ढूँढ़िए।”
सोनिया रोते हुए बोली—
“साहब, मेरा बेटा अस्थमा का मरीज है। वह कहाँ होगा? किस हालत में होगा? उसे जल्दी ढूँढ़िए।”
इंस्पेक्टर चतुर सिंह ने गंभीर स्वर में कहा—
“आप दोनों शांत हो जाइए। बच्चे की उम्र?”
“दस साल,” सुनील ने कहा।
“कोई दुश्मनी? व्यापार में विवाद? किसी से झगड़ा?”
सुनील कुछ सोचकर बोला—
“व्यापार में प्रतिस्पर्धी तो हैं, लेकिन किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं कि वह मेरे बेटे का अपहरण कर ले।”
इंस्पेक्टर ने कहा—
“फिर भी हमें हर पहलू की जाँच करनी होगी। संभव है कि अपहरण फिरौती के लिए किया गया हो।”
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।
सोहम का फोटो सभी थानों में भेज दिया गया।
घर के सभी नौकरों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई।
इसी दौरान एक सिपाही ने इंस्पेक्टर को सूचना दी—
“सर, घर के दो कर्मचारी अचानक छुट्टी लेकर गाँव चले गए हैं।”
इंस्पेक्टर चतुर सिंह की आँखें सिकुड़ गईं।
“नाम?”
“मनीलाल और उसका एक साथी।”
“तुरंत चलो उनके गाँव।”
पुलिस जब मनीलाल के गाँव पहुँची, तो वह अपने घर के बाहर बैठा मिला।
पुलिस की गाड़ी देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
इंस्पेक्टर चतुर सिंह उसके सामने खड़े हो गए।
“तूने अचानक छुट्टी क्यों ली?”
मनीलाल घबरा गया।
“वो… साहब… मेरी माँ बीमार थी।”
“अच्छा?”
इंस्पेक्टर ने आसपास देखा।
“कहाँ है तेरी माँ?”
मनीलाल ने धीरे से घर की ओर इशारा किया।
कुछ ही देर में उसकी माँ बाहर आई।
वह बिल्कुल स्वस्थ दिखाई दे रही थी।
इंस्पेक्टर ने मनीलाल की ओर घूरकर देखा।
“तेरी माँ तो बिल्कुल ठीक है।”
मनीलाल चुप रहा।
तभी घर के सामने एक बड़ी वैन आकर रुकी।
उसमें से नया एसी, फ्रिज, कूलर और कई महँगे सामान उतारे जाने लगे।
इंस्पेक्टर ने पूछा—
“ये सब किसका है?”
मनीलाल हकलाने लगा।
“म… मेरा है, साहब।”
“इतने पैसे कहाँ से आए?”
“थोड़ा-थोड़ा करके बचाए थे।”
इंस्पेक्टर चतुर सिंह की आवाज कठोर हो गई।
“मनीलाल, झूठ बोलने की आदत छोड़ दे। तेरी तनख्वाह हम जानते हैं। सच बोल, वरना अपहरण के मामले में तुझे सीधे जेल भेज दिया जाएगा।”
मनीलाल के माथे पर पसीना आ गया।
कुछ देर बाद वह टूट गया।
“साहब… मैंने सोहम को नहीं उठाया।”
“तो क्या किया?”
“मुझे सिर्फ उसे घर से बाहर निकालने के लिए कहा गया था।”
“किसने कहा था?”
“मैं… मैं नहीं जानता।”
इंस्पेक्टर गरजे—
“मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश मत कर!”
“सच बोल रहा हूँ, साहब! मुझे एक फोन आता था। उसी पर निर्देश मिलते थे।”
“फोन दे।”
मनीलाल काँपते हाथों से अपना मोबाइल आगे बढ़ाने लगा।
इंस्पेक्टर ने नंबर देखा और तुरंत कहा—
“इस नंबर को ट्रैक करो। पता लगाओ, यह किसका है।”
कुछ समय बाद सूचना मिली।
नंबर एक महिला के नाम पर दर्ज था।
नाम था रम्या।
पुलिस तुरंत रम्या के घर पहुँची।
वह सामान बाँध रही थी।
इंस्पेक्टर ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा—
“कहीं जाने की तैयारी है, रम्या?”
रम्या चौंक गई।
“नहीं… मैं तो…”
“सुनील साहब का बेटा कहाँ है?”
रम्या का चेहरा पीला पड़ गया।
“मुझे कुछ नहीं मालूम।”
इंस्पेक्टर ने कठोर स्वर में कहा—
“देखो, सच बोल दो। बच्चा जिंदा है तो हमें तुरंत बताओ।”
रम्या की आँखों में डर दिखाई दिया।
“मैंने… मैंने बस छोटे बाबू को चौराहे तक छोड़ा था।”
“किसके पास छोड़ा?”
“मुझे नहीं मालूम।”
“झूठ!”
“साहब, सच कह रही हूँ। मुझे बस इतना ही करने को कहा गया था।”
“किसने?”
रम्या ने धीमे स्वर में कहा—
“शायद… सज्जाद जानता होगा।”
“ये सज्जाद कौन है?”
“वह रघुवीर जी का बहुत पुराना और वफादार नौकर है।”
“रघुवीर कौन?”
रम्या चुप हो गई।
इंस्पेक्टर ने दोबारा पूछा—
“कौन है रघुवीर?”
“बीकानेर के बहुत बड़े व्यवसायी हैं।”
पुलिस ने सज्जाद की तलाश शुरू कर दी।
जल्द ही पता चला कि रघुवीर अपनी पत्नी का इलाज कराने पहाड़ी इलाके में आए हुए हैं। उनकी पत्नी वर्षों पहले एक भयानक सदमे के कारण मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गई थीं।
इंस्पेक्टर ने कहा—
“अब सारे सूत्र एक ही दिशा में जा रहे हैं। हमें तुरंत उस पहाड़ी इलाके में पहुँचना होगा।”
सुनील और सोनिया भी पुलिस के साथ चल पड़े।
पहाड़ी इलाके में एक पुराने से बंगले के सामने पुलिस की गाड़ियाँ रुकीं।
सोनिया गाड़ी से उतरी ही थी कि अचानक उसकी नजर सामने खड़े एक व्यक्ति पर पड़ी।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
उसके होंठ काँपने लगे।
“अ… अंकल?”
वह व्यक्ति धीरे-धीरे उनकी ओर मुड़ा।
वह था, रघुवीर।
सोनिया की आँखों में भय साफ दिखाई दे रहा था।
“आप… आप यहाँ?”
रघुवीर की आँखों में वर्षों का दर्द और प्रतिशोध जल रहा था।
सोनिया अचानक उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
“अंकल, मेरा बेटा कहाँ है? आपने मेरे बेटे को अगवा किया? क्यों? आखिर क्यों?”
रघुवीर के होंठों पर एक दर्दभरी मुस्कान आई।
“क्यों?”
वह धीरे-धीरे बोला—
“तुझे सच में नहीं पता कि क्यों?”
“मेरा बेटा कहाँ है?” सोनिया चीख पड़ी।
रघुवीर ने पहाड़ की ओर देखा।
“शायद… अब तक तो चील-कौए उसे खा चुके होंगे।”
“नहीं!”
सोनिया वहीं जमीन पर गिर पड़ी।
“नहीं… आप ऐसा नहीं कर सकते।”
रघुवीर की आवाज अचानक गूँज उठी—
“क्यों नहीं कर सकता?”
वह सोनिया के पास आया।
“जब तू ऐसा कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं?”
सुनील स्तब्ध खड़ा था।
“सोनिया, ये सब क्या कह रहे हैं?”
रघुवीर ने सुनील की ओर देखा।
“तुम्हें अपनी पत्नी का अतीत नहीं पता?”
सोनिया ने आँखें बंद कर लीं।
रघुवीर बोला—
“मेरे इकलौते बेटे की मंगनी इससे हुई थी।”
सुनील अवाक रह गया।
“क्या?”
“लेकिन मैडम को किसी और से प्रेम था। इन्होंने अपने प्यार के लिए मेरे बेटे को रास्ते से हटा दिया।”
सोनिया काँपते हुए बोली—
“अंकल…”
“चुप!”
रघुवीर की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“याद है वह पहाड़? याद है वह दिन?”
सोनिया के होंठ सूख गए।
रघुवीर चिल्लाया—
“तूने मेरे बेटे को इसी पहाड़ से धक्का दिया था!”
चारों ओर सन्नाटा छा गया।
सुनील ने अविश्वास से सोनिया को देखा।
“सोनिया… क्या यह सच है?”
सोनिया रोते हुए जमीन पर बैठ गई।
“हाँ…”
सुनील के पैरों तले जमीन खिसक गई।
सोनिया ने काँपती आवाज में कहा—
“मैं अपने प्रेम के अंधेपन में पागल हो गई थी। मेरी मंगनी उनके बेटे से हो चुकी थी, लेकिन मैं किसी और से प्रेम करती थी।”
वह रोते हुए बोली—
“मैंने उससे कहा था कि वह मुझे छोड़ दे। वह नहीं माना। उस दिन हम दोनों पहाड़ पर गए थे। हमारी बहस हुई… और गुस्से में… मैंने उसे धक्का दे दिया।”
रघुवीर ने दाँत भींचते हुए कहा—
“और फिर तूने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा!”
सोनिया फूट पड़ी।
“मैं डर गई थी। मुझे लगा था कि अगर सच सामने आ गया तो मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। इसलिए मैं भाग गई।”
रघुवीर ने पीड़ा से कहा—
“मेरे बेटे की मौत के बाद मेरी पत्नी टूट गई।”
उसने दूर कमरे की ओर इशारा किया।
“आज भी वह जिंदा लाश की तरह जी रही है। कभी सोचा तूने कि हमारे साथ क्या बीती?”
सोनिया हाथ जोड़कर बोली—
“अंकल, मैंने अपराध किया है। बहुत बड़ा अपराध। लेकिन मेरे बेटे को सजा मत दीजिए। वह निर्दोष है।”
रघुवीर ने कहा—
“जब तूने मेरे बेटे को धक्का दिया था, तब वह भी निर्दोष था!”
इंस्पेक्टर चतुर सिंह आगे आए।
“रघुवीर जी, आपका दर्द समझा जा सकता है, लेकिन कानून किसी को बदला लेने की अनुमति नहीं देता।”
रघुवीर ने कटु स्वर में कहा—
“कानून? जब मेरा बेटा मरा, तब कहाँ था कानून?”
इंस्पेक्टर ने दृढ़ता से कहा—
“कानून देर से पहुँचे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम स्वयं अपराधी बन जाएँ।”
अचानक…
“मम्मी…!”
सभी चौंक गए।
सोनिया बिजली की तरह उठ खड़ी हुई।
“सोहम!”
फिर आवाज आई—
“मम्मी… मुझे बचाओ!”
सोनिया दौड़ने लगी।
“सोहम!”
इंस्पेक्टर ने तुरंत कहा—
“कोई भी अकेले आगे नहीं जाएगा। जवानों, चारों तरफ तलाशी लो!”
कुछ ही दूरी पर एक गुफानुमा जगह से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी।
एक पुलिसकर्मी अंदर गया।
कुछ क्षण बाद उसकी आवाज गूँजी—
“सर! बच्चा मिल गया!”
सोनिया की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
“सोहम!”
वह दौड़कर अपने बेटे के पास पहुँची और उसे कसकर गले लगा लिया।
“मम्मी… मुझे बहुत डर लग रहा था।”
सोनिया रोते हुए बोली—
“अब कुछ नहीं होगा, बेटा। मैं आ गई हूँ।”
सोहम ने माँ से पूछा—
“मम्मी, ये अंकल मुझे क्यों लाए थे?”
सोनिया ने रघुवीर की ओर देखा।
रघुवीर की आँखें नम हो चुकी थीं।
उसे अपने बेटे का चेहरा दिखाई देने लगा।
मानो वर्षों पहले उसका बेटा भी इसी तरह पुकार रहा हो—
“पापा… मुझे बचा लो…”
रघुवीर काँप गया।
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
“मैं क्या करने जा रहा था?”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“एक मासूम बच्चे को मारकर क्या मेरा बेटा वापस आ जाता?”
इंस्पेक्टर ने कहा—
“नहीं, रघुवीर जी। बदला कभी न्याय नहीं बन सकता।”
रघुवीर धीरे-धीरे सोनिया के पास आया।
सोनिया डरकर पीछे हट गई।
लेकिन रघुवीर ने केवल इतना कहा—
“आज इस बच्चे को देखकर मुझे अपने बेटे का चेहरा दिखाई दे रहा है।”
उसकी आवाज भर्रा गई।
“जिस दर्द ने मुझे वर्षों तक जलाया, वही दर्द मैं तुझे देना चाहता था। लेकिन अब समझ आया है कि दर्द बाँटने से कम नहीं होता, वह और बढ़ जाता है।”
सोनिया उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
“मैं अपने अपराध की जिम्मेदारी स्वीकार करती हूँ। अब मैं सच से नहीं भागूँगी।”
इंस्पेक्टर चतुर सिंह ने कहा—
“और अब कानून अपना काम करेगा।”
रघुवीर को सोहम के अपहरण और उसकी जान को खतरे में डालने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
मनीलाल, रम्या, सज्जाद और इस साजिश में शामिल अन्य लोगों को भी हिरासत में ले लिया गया।
सोनिया ने भी पुलिस के सामने वर्षों पुराने अपराध का पूरा सच स्वीकार कर लिया।
पुराने मामले की दोबारा जाँच शुरू हुई।
कुछ दिनों बाद अदालत में दोनों मामलों की सुनवाई हुई।
न्यायाधीश ने कहा—
“मनुष्य अपने कर्मों से भाग सकता है, लेकिन उनके परिणामों से नहीं। अपराध प्रेम के नाम पर किया जाए, क्रोध में किया जाए या प्रतिशोध में—अपराध, अपराध ही रहता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“लेकिन किसी निर्दोष बच्चे को किसी दूसरे व्यक्ति के कर्मों की सजा देना उससे भी बड़ा अन्याय है।”
रघुवीर को अपहरण और बच्चे की जान को खतरे में डालने के अपराध में सजा सुनाई गई।
सोनिया को भी अपने पुराने अपराध के लिए कानून के अनुसार दंड मिला।
समय धीरे-धीरे बीत गया।
सोनिया ने अपनी सजा पूरी की।
जिस दिन वह जेल से बाहर आई, उसकी आँखें झुकी हुई थीं। वह सोच रही थी कि शायद अब उसके लिए कोई नहीं आएगा।
लेकिन बाहर सुनील खड़ा था।
उसके साथ सोहम भी था।
सोनिया की आँखें भर आईं।
“तुम… तुम लोग मुझे लेने आए हो?”
सुनील ने शांत स्वर में कहा—
“तुम्हारी गलती बहुत बड़ी थी, सोनिया। उसे भुलाया नहीं जा सकता।”
सोनिया की आँखों से आँसू बहने लगे।
सुनील ने आगे कहा—
“लेकिन अपनी गलती स्वीकार करना और उसके परिणामों का सामना करना भी साहस की बात है। अगर इंसान सच्चे मन से पश्चाताप करे और बदलने की कोशिश करे, तो उसे जीवन सुधारने का एक अवसर मिलना चाहिए।”
सोहम दौड़कर अपनी माँ से लिपट गया।
“मम्मी, अब आप मुझे छोड़कर कहीं मत जाना।”
सोनिया ने उसे कसकर गले लगा लिया।
“नहीं बेटा… अब कभी नहीं।”
उधर जेल में रघुवीर भी अपने किए पर पश्चाताप करने लगा।
उसने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित लोगों के उपचार के लिए काम करने वाली संस्था को दान कर दिया।
वह अक्सर अन्य कैदियों से कहता—
“बदला लेने से घाव नहीं भरते। घाव तभी भरते हैं, जब हम न्याय का रास्ता चुनते हैं।”
बरसों बाद सोनिया अपने बेटे सोहम के साथ उसी पहाड़ी रास्ते पर खड़ी थी।
सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे से निकल रहा था।
वही पहाड़…
जहाँ कभी उसके एक अपराध ने एक परिवार की खुशियाँ छीन ली थीं।
और वहीं वर्षों बाद प्रतिशोध ने उसके अपने बेटे की जान को खतरे में डाल दिया था।
सोहम ने माँ का हाथ पकड़कर पूछा—
“मम्मी, आप इस पहाड़ को इतनी देर से क्यों देख रही हैं?”
सोनिया ने आसमान की ओर देखा।
उसकी आँखों में पश्चाताप भी था और एक नई आशा भी।
उसके मन में अतीत चलचित्र बनकर चलने लगा। वह बोली—
“अतीत की परछाइयाँ मुझे हमेशा ही सालती रही हैं और आज यह परिणाम सामने आया है।”
वह बोली—
“क्योंकि बेटा, जिंदगी हमें बार-बार सिखाती है कि हमारा कोई भी कर्म छोटा नहीं होता। हमारे एक फैसले का असर कई जिंदगियों पर पड़ सकता है।”
“तो हमें क्या करना चाहिए?” सोहम ने मासूमियत से पूछा।
सोनिया मुस्कराई।
“हमें हमेशा सच का साथ देना चाहिए। गलती हो जाए तो उसे छिपाना नहीं चाहिए। और सबसे बड़ी बात… किसी के साथ हुए अन्याय का जवाब किसी दूसरे के साथ अन्याय करके नहीं देना चाहिए।”
“क्यों?” सोहम ने धीरे से कहा।
सोनिया ने उसे अपने पास खींच लिया।
“क्योंकि बेटा, बुराई का जवाब बुराई से देने पर दुनिया में केवल दर्द बढ़ता है। न्याय से शांति मिलती है, लेकिन बदले से केवल एक नया अपराध जन्म लेता है।”
पहाड़ों के पीछे से निकलती सूरज की किरणें धीरे-धीरे अंधकार को मिटा रही थीं।
सोनिया ने महसूस किया कि जैसे वर्षों से उसके जीवन पर छाया अपराध, भय और प्रतिशोध का अंधेरा भी धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।
उसने सोहम का हाथ कसकर पकड़ लिया।
