
सपना चन्द्रा. कहलगांव भागलपुर (बिहार)
खिलने लगे हैं पलाश
महीनों से सूने मैदानों में।
पलाश के जंगल, जंगल नहीं,
दहकती हुई आग हैं
सुर्ख लाल, पीली लपटों जैसी।
त्रिपर्णक, ज्यों त्रिदेव,
चंद्राकार पंखुड़ियाँ
बसंत को सराह रही हैं।
खिलेंगे बुरांश भी जल्द ही
पहाड़ों के सीने पर
लाल, गुलाबी!
खट्टा-मीठा-सा,
तासीर में ठंडा मगर
यौवन का उसमें ताव है।
वैसी ही आग,
वैसी ही अनुभूति,
मानो लपटें बहक रही हों।
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