
मौसमी चंद्रा, पटना
कभी-कभी मुझे लगता है, प्रेम के बारे में हमारी सबसे बड़ी भूल यही है कि हम उसे पाने की चीज़ समझ लेते हैं, ज्यादातर! है न!
जैसे कोई व्यक्ति हमारे जीवन में आए, हमें चुने, हमारा हाथ थामे और फिर हमेशा के लिए हमारा हो जाए और हम इसे प्रेम की पूर्णता मान लें!
क्या फैंटेसी है!
मैं भी ऐसा ही सोचती थी… लेकिन विक्रांत से मिलने के बाद मुझे इस पर संदेह होने लगा था.
वो मुझे बेहद चाहता था, लेकिन चुपचाप से! बिना किसी शोशेबाज़ी, बिना हो-हल्ले के! वैसी पाजेब, जिसकी छन की भी आवाज़ न सुनाई दे! चुप्पा प्रेम! लेकिन फिर भी वह मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के छोटे-छोटे कोनों में खनकता रहता था.
मैं पुरवाई! पहले मेरा नाम कुछ और था… मम्मी-पापा का रखा हुआ, लेकिन थोड़े बड़े होने पर मुझे वो जमा नहीं. फिर क्या! मैंने खुद ही अपना नाम रख लिया, नए स्कूल के रजिस्टर में दर्ज करवा लिया! घर में सबको तब पता चला, जब आई-कार्ड बनकर आया.
खैर… तो बात विक्रांत की.
प्यारा दोस्त था मेरा. मैंने उससे वो बातें भी बताईं, जिन्हें कहने के बाद अक्सर हम सामने वाले की आँखों में एक हल्की-सी निराशा ढूँढ़ने लगते हैं.
मैंने उसे अपने डर बताए थे, अपनी अधूरी चीज़ें, जो मिलते-मिलते छूट गई थीं मुझसे… अपने स्वभाव की कड़वाहट बताई, अपनी बेचैनियाँ और अपने वे दिन भी, जब मैं बिना किसी वजह के लोगों से दूर हो जाती थी.
एक बार मैंने उससे कहा था-
“तुम जितनी अच्छी मुझे समझते हो, मैं बहुत अच्छी लड़की नहीं हूँ.”
वह कुछ देर मुझे देखता रहा…
फिर बोला-
“थोड़ी अच्छी हो न! मैं झेल लूँगा!”
मैं हँस पड़ी थी! उसने बात वहीं छोड़ दी.
शायद यही उसकी सबसे ख़तरनाक खूबसूरती थी. वह मेरी हर बात को सुधारने की कोशिश नहीं करता था.
मैं कभी सजती, तो वह कहता…
“आज बहुत खुश लग रही हो.”
सुंदर रूप देकर भेजा था ईश्वर ने मुझे. बहुत तारीफ़ें मिलती थीं. केवल उसने कभी सुंदर नहीं कहा.
मैं कभी-कभी पूछ बैठती, “आज तो बोलो, तुम सुंदर लग रही हो!”
वो हँसकर कहता…
“बहुत खुश लग रही हो आज भी! तभी इतना साज-श्रृंगार हुआ है!”
उसने मुझे कभी यह महसूस नहीं कराया कि सुंदर दिखना मेरे प्रेम के योग्य होने की शर्त है.
एक दिन मैंने उससे पूछा-
“तुम्हें मुझमें सबसे अच्छी बात क्या दिखती है?”
वह मुस्कुराया.
“तुम!”
“ये कौन-सा जवाब है?” मुझे चिढ़ हुई!
“अरे! चिढ़ क्यों रही हो! अच्छी-बुरी जो भी बातें हैं, सब तो तुमसे ही हैं न! तुम ही करती हो न बक-बक, बक-बक! तो बस तुम्हारी सारी बक-बक सुनता हूँ और उसे याद रखता हूँ!”
मैंने उसे झुँझलाकर देखा.
वह हँसने लगा.
उसे सचमुच मेरी छोटी-छोटी बातें याद रहती थीं.
मैंने महीनों पहले कहा था कि मुझे शाम के समय खिड़की के पास बैठना अच्छा लगता है.
जब कभी हम बात करते और मैं कहती, “आज उदास लग रहा मन!”
तो वो झट से कहता-
“कॉफी बनाओ और थोड़ी देर खिड़की के पास बैठ जाओ?”
मैंने कभी उसे नहीं बताया था कि उसकी ये अच्छाई मुझे भीतर तक छू जाती है… आखिर इतनी बड़ी दुनिया में भागते-दौड़ते, अपने-अपने कामों में व्यस्त लोगों की भीड़ में कौन ही होता होगा, जिसे मामूली-सी शख्सियत वाली लड़की की बेख़्याली में बोली गई छोटी-छोटी बातें याद रहेंगी!
लेकिन कोई तुम्हारी वह छोटी-सी आदत याद रखे, जिसका तुम्हें खुद भी ठीक से पता नहीं, तो शायद वहाँ प्रेम किसी और ही रूप में मौजूद होता है.
मैं उसे अक्सर नज़रअंदाज़ करती थी.
संदेश देखती और उत्तर देना भूल जाती.
कभी ऑनलाइन होकर भी उससे बात नहीं करती, कभी उसके सवाल का उत्तर दो शब्दों में देकर चली जाती.
वह पूछ सकता था-
“मुझसे नाराज़ हो?”
…लेकिन वह पूछता-
“आज व्यस्त हो?”
इन दोनों प्रश्नों के बीच जितनी दूरी है, उतनी शायद प्रेम और अधिकार के बीच होती है.
फिर मेरी ज़िंदगी बदलने लगी. नई जॉब, नई ज़िम्मेदारी… मेरे पास उसके लिए समय कम होता गया.
और फिर एक दिन मैंने उसे साफ़-साफ़ कह दिया-
“विक्रांत, मेरी ज़िंदगी अब उस जगह पर नहीं है, जहाँ मैं तुम्हें वह सब दे सकूँ, जिसकी शायद तुम्हें ज़रूरत है. तो मुझे लगता है, अब हमें अपने-अपने करियर पर ज़्यादा फोकस करना चाहिए.”
वह चुप रहा.
मुझे लगा, अब शिकायत आएगी… नहीं आई.
मुझे लगा, वह कहेगा कि मैंने उसके साथ अन्याय किया है.
उसने ऐसा भी नहीं कहा.
बस पूछा-
“तुम ठीक हो?”
मैंने पहली बार उस दिन उसके प्रेम से डरना शुरू किया, क्योंकि प्रेम का इतना शांत होना मुझे असहज कर रहा था.
मैंने कहा-
“तुम्हें बुरा नहीं लगा?”
वह बोला-
“लगा है.”
मैंने उसकी तरफ़ देखा.
“तो?”
“तो क्या?”
“तो बोलो कुछ!”
उसने बहुत धीरे से कहा-
“हर दुख का दोषी कोई व्यक्ति हो, यह ज़रूरी नहीं. कुछ दुःख हमारे अपने लिए हुए होते हैं.”
उस दिन मुझे लगा, शायद प्रेम की एक परिभाषा मैंने पहली बार सुनी है.
कुछ समय बाद हमारी बातें और कम हो गईं.
एक सुबह मेरी तबीयत ठीक नहीं थी.
मैंने किसी से कुछ नहीं कहा था.
उसका संदेश आया-
“आज बाहर मत जाना, मौसम बहुत खराब है.”
मैंने लिखा-
“तुम्हें कैसे पता कि मैं बाहर जाने वाली हूँ?”
उसने कहा-
“पिछली बार तुमने बताया था कि मंगलवार को तुम्हारा काम बाहर होता है.”
मैं फोन हाथ में लिए बहुत देर तक बैठी रही.
वह आदमी, जिसे मैं अपनी ज़िंदगी में जगह नहीं दे पा रही थी, मेरी ज़िंदगी की छोटी-छोटी जगहों को कितनी सावधानी से सँभालकर रखे हुए था.
तब पहली बार मुझे समझ आया… किसी को प्रेम करना और किसी को अपने जीवन में रखना, शायद एक ही बात नहीं है.
हम अक्सर प्रेम को उपस्थिति से नापते हैं.
कितने संदेश आए, कितनी मुलाक़ातें हुईं, कितनी तस्वीरें साथ में हैं.
कितनी बार किसी ने कहा- “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.”
लेकिन विक्रांत ने मुझे कभी नहीं कहा कि वह मेरे बिना नहीं रह सकता.
उसने बस इतना किया कि मेरे होने को कभी बोझ नहीं बनाया, उसने मुझे बाँधा नहीं, मेरे बदल जाने पर मुझे अपराधी नहीं बनाया, मेरी दूरियों को अपनी हार नहीं माना…
और सबसे अजीब बात… उसने मुझे कभी अपना बनाने की कोशिश नहीं की.
शायद इसलिए उसका प्रेम मुझे अपना-सा लगता रहा.
बहुत बाद में मुझे समझ आया कि जीवन में हम जिस प्रेम की तलाश करते हैं, वह हमेशा वह नहीं होता, जो हमें अपने पास खींच ले.
मैं नहीं जानती, विक्रांत और मैं अंततः साथ रहेंगे भी या नहीं!
इस तरह के प्रेम को संजोने की काबिलियत मुझमें शायद नहीं है… मुझमें भी दुनिया की भगदड़ का हिस्सा बनने की जल्दी है.
पर एक बात तो है, ये प्रेम मेरी स्मृति में किसी पुराने खुशनुमा मौसम की तरह ठहरा रहेगा.
और जब कभी जीवन में हम सब हासिल करके भी खाली होकर बैठे रहेंगे, तब वो भीतर से आवाज़ लगाएगा-
“उदास लग रही हो? कॉफी बनाओ और खिड़की के पास बैठ जाओ…”
आह… मेरा चुप्पा प्रेम!

बेहद शुक्रिया 🙏
वाह, शानदर कहानी दी, हमेशा की तरह ❤️❤️