डाक बंगले की स्मृतियों से : एक कस्बे के बदलते समय की खट्टी-मीठी दास्तान

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
मैं डाक बंगला हूं.
आओ… बैठो मेरे बरामदे में.
घबराओ मत. मैं कोई भूत बंगला नहीं हूं.
हां, थोड़ा बूढ़ा जरूर हो गया हूं.
मेरी दीवारों का चूना अब जगह-जगह झड़ने लगा है. कुछ खिड़कियों पर धूल की परत जम गई है. लकड़ी के दरवाजे अब पहले की तरह खुलते नहीं, बस चरमराकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं. मेरे बरामदे में पसरी खामोशी भी अब मेरी पहचान का हिस्सा बन गई है.
लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था.
कभी मैं भी जवान था.
मेरी छत नई थी. दीवारों पर सफेदी चमकती थी. मेरे आंगन की फूलों की क्यारियां मौसम के साथ रंग बदलती थीं और मेरे बरामदे में कदमों की आहट कभी खत्म नहीं होती थी.
तुम मुझे डाक बंगला कहते हो.
सरकारी कागजों में मेरा नाम क्या रहा होगा, यह बात शायद अब बहुत कम लोग जानते हैं. लेकिन इस कस्बे ने मुझे हमेशा डाक बंगला ही कहा.
और नाम चाहे जो रहा हो… मैंने इस जगह को बहुत करीब से देखा है.
मैंने तुम्हारे गांव को पैदा होते नहीं देखा, लेकिन उसे बदलते जरूर देखा है.
जब मैं यहां आया था, तब यह इलाका आज जैसा नहीं था. सड़क कच्ची थी. बारिश होती तो रास्ते कीचड़ में बदल जाते. आज जहां कमलकिशोर त्रिवेदी और रहमान भाई का घर है, वहां कभी एक बड़ा-सा गड्ढा रहता था. बरसात में पानी भर जाता और गर्मियों में उसी जगह से धूल उड़ती रहती.

बैलगाड़ियों के पहिए कच्ची सड़क पर अपने निशान छोड़ जाते थे.
उन दिनों मैं सरकारी अधिकारियों के ठहरने की जगह था.
सड़क, पुल, जमीन, जंगल, सिंचाई, पुलिस, राजस्व… न जाने कितने कामों के सिलसिले में लोग मेरे यहां आते थे.
कोई जिला अधिकारी.
कोई तहसीलदार.
कोई इंजीनियर.
कोई पुलिस अधिकारी.
कोई वन अधिकारी.
वे आते. मेरे कमरे में अपना सामान रखते. रात मेरे यहां बिताते और सुबह होते ही गांव-कस्बे की ओर निकल जाते.
मेरे बरामदे में नक्शे खुलते थे.
कागजों पर लकीरें खिंचती थीं.
कभी सड़क की बात होती, कभी पुल की.
कभी किसी खेत की नाप पर चर्चा होती, तो कभी किसी गांव की शिकायत पर.
मैं चुपचाप सब सुनता रहता था.
मेरी सबसे बड़ी आदत थी—देखना और सुनना.
शायद इसीलिए मेरे पास कहानियां बहुत हैं.
मेरी जवानी के दिनों की बात ही कुछ और थी.

मेरी फूलों की क्यारियां दूर-दूर तक मशहूर थीं. लोग यहां सिर्फ ठहरने नहीं, तस्वीरें खिंचवाने भी आते थे. कितने युवक-युवतियों की तस्वीरें मेरी क्यारियों के सामने खिंचीं और फिर वही तस्वीरें रिश्तों की बातचीत का हिस्सा बनीं, इसका हिसाब मैंने कभी नहीं रखा.
किसी के हाथ में फूल था.
किसी के चेहरे पर नई उम्र की झिझक.
किसी तस्वीर में पूरा परिवार था.
और कुछ तस्वीरें ऐसी थीं, जिन्हें देखकर मुझे लगता था कि इनके पीछे कोई कहानी जरूर है.
एक बार मेरे यहां फिल्म की शूटिंग भी हुई थी.
मेरे आंगन में कैमरे आए. रोशनी लगी. कलाकार आए. कई दिनों तक मेरे शांत बरामदे में फिल्मी दुनिया की चहल-पहल रही.
लेकिन वह फिल्म आखिर पर्दे तक पहुंची या नहीं, इसकी कहानी मैं फिर कभी सुनाऊंगा.
क्योंकि मेरी हर कहानी एक ही दिन में सुनाई नहीं जा सकती.
दशहरे के दिन भी मेरा आंगन खूब सजता था.
जब रावण दहन होता, तो सजे-धजे लोग इधर से गुजरते और मेरी फूलों की क्यारियों, पुराने पेड़ों और बरामदे के साथ तस्वीरें खिंचवाते.

तब मेरे पास आने वाले लोगों के पास मोबाइल नहीं होते थे.
एक तस्वीर के लिए भी इंतजार करना पड़ता था.
शायद इसीलिए तस्वीरों की कीमत भी ज्यादा होती थी.
लेकिन अगर तुम मुझसे पूछो कि मेरे सबसे अपने कौन थे, तो मैं बिना सोचे एक ही नाम लूंगा.
मेरा चौकीदार.
उसके हाथ में मेरी चाबी रहती थी.
सुबह सबसे पहले वही मेरे दरवाजे खोलता.
बरामदे में झाड़ू लगाता.
पानी का छिड़काव करता.
कुएं से पानी भरता.
मेरे कमरों की चारपाइयां ठीक करता.
और जब कोई अधिकारी आने वाला होता, तो घंटों पहले से तैयारी में लग जाता.
उसने मेरी दीवारों को मुझसे ज्यादा करीब से देखा था.

कितनी खिड़कियों के शीशे टूटे, कितनी बार मेरी छत टपकी, किस कमरे में कौन अधिकारी सोया, किस दिन किसने क्या खाना खाया… उसे सब याद रहता था.
बाद के दिनों में मेरे यहां कुछ रईसजादों की महफिलें भी सजने लगी थीं.
वे आते, चौकीदार को कुछ पैसे देते, खाने-पीने का इंतजाम करवाते और कुछ घंटों के लिए मेरी खामोशी को अपनी आवाजों से भर देते.
उन रातों की भी अपनी कहानियां हैं.
लेकिन वे कहानियां फिर कभी.
क्योंकि हर कहानी का अपना समय होता है.
चौकीदार की उम्र भी बढ़ती गई.
और मेरी भी.
एक दिन वह मेरी दीवार से टिककर काफी देर तक खड़ा रहा.
फिर धीरे से बोला—
“बंगले… अब हम दोनों बूढ़े हो गए हैं.”
उस दिन पहली बार मुझे लगा कि इमारतें भी बूढ़ी होती हैं.
मेरी आंखों के सामने इस कस्बे की कच्ची सड़क बदली.
पहले पत्थर पड़े.
फिर डामर बिछा.
और एक दिन वह सड़क पक्की हो गई.
मुझे लगा जैसे कस्बे ने पहली बार अपने पैरों में जूते पहन लिए हों.
बैलगाड़ियां कम होने लगीं.
जीपें बढ़ने लगीं.
फिर बस आई.
फिर मोटरसाइकिलें.
और धीरे-धीरे कारें भी आने लगीं.
जिस रास्ते पर कभी शाम तक दो-चार लोग दिखाई देते थे और रात में तो क्या, दिन में भी लोग आने-जाने से कतराते थे, वही रास्ता एक दिन शोर से भर गया.
मैं सड़क को देखता रहा.
सोचता रहा—
क्या यही तरक्की है?
शायद हां.
लेकिन उस तरक्की के साथ कुछ आवाजें पीछे छूट गईं.

बैल की घंटियां.
बैलगाड़ी की चरमराहट.
पैदल लौटते किसानों की बातचीत.
दूध वालों की साइकिल की घंटियां.
कैन के आपस में टकराने की आवाज.
और वह धूल…
जो कभी उड़ती हुई मेरे आंगन तक चली आती थी.
पहले मैं रात को लालटेन की पीली रोशनी में जागता था.
फिर गांव में बिजली आई.
सफेद रोशनी ने अंधेरे को पीछे धकेल दिया.
हाई मास्ट लगे.
रातें उजली हो गईं.
लेकिन मुझे तब भी पता नहीं था कि असली बदलाव अभी बाकी था.
खेती बदली.
किसान की चाल बदली.
गांव की रफ्तार बदली.
और धीरे-धीरे गांव तेज होने लगा.
बहुत तेज.
लेकिन मैं वहीं था.
अपनी जगह.
अपनी दीवारों के साथ.
अपनी खिड़कियों के साथ.
अपनी यादों के साथ.
मैंने रेडियो को भी आते देखा.
बड़ी होटल, शिवनारायणजी पोरवाल की होटल और सतनाम सेठ के यहां वाल्व वाले रेडियो बजते थे.
उस समय रेडियो केवल एक मशीन नहीं था.
वह गांव के लिए बाहर की दुनिया की पहली खिड़की था.
लोग रेडियो के आसपास बैठते और दूर-दराज की खबरें सुनते.
गांव पहली बार अपनी गलियों से बाहर की दुनिया को सुन रहा था.
फिर टीवी आया.
फिर केबल.
फिर मोबाइल.
फिर इंटरनेट.
और अब…
अब तो पूरी दुनिया आदमी की जेब में रहती है.

पहले दुनिया तक पहुंचने के लिए आदमी चलता था.
फिर दुनिया रेडियो से उसके घर आई.
टीवी ने उसे कमरे में बैठा दिया.
और मोबाइल ने पूरी दुनिया को उसकी हथेली पर रख दिया.
मैंने रिश्तों को भी बदलते देखा है.
गांव की बेटियां कभी डोली में विदा होती थीं.
पूरा गांव इकट्ठा होता था.
ढोल बजते थे.
औरतों के रोने की आवाजें आती थीं.
दुल्हन जाते-जाते कभी मेरी तरफ भी देख लेती थी.
शायद उसे पता भी नहीं होता था कि मैं उसे देख रहा हूं.
कई बेटे शहर गए.
कुछ लौट आए.
कुछ फिर कभी नहीं लौटे.
कुछ ने गांव में घर बनाए, लेकिन रहने के लिए शहर चुन लिया.
कुछ खेत बिक गए.
कुछ खेतों पर मकान बन गए.
जहां कभी गेहूं लहलहाता था, वहां अब सीमेंट की दीवारें खड़ी हैं.
जहां बच्चे पेड़ के नीचे खेलते थे, वहां अब दुकान है.
और जहां लोग शाम को बैठकर घंटों बातें करते थे, वहां अब कई बार लोग एक-दूसरे के पास बैठे हुए भी मोबाइल की स्क्रीन देखते हैं.
लेकिन एक बात मैं तुम्हें साफ-साफ बता दूं.
गांव पूरी तरह नहीं बदला.
बहुत कुछ बदला है.
लेकिन सब कुछ नहीं.
आज भी किसी घर में बेटी पैदा होती है तो खुशियां मनती हैं.
आज भी किसान आसमान की तरफ देखकर बारिश का इंतजार करता है.
आज भी मां अपने बेटे के लौटने का रास्ता देखती है.
आज भी कोई बूढ़ा शाम को बरामदे में बैठकर बीते दिनों को याद करता है.
और शायद इसी वजह से मैं अब भी इस कस्बे से जुड़ा हुआ हूं.
क्योंकि गांव या कस्बा सिर्फ सड़क, मकान, खेत और दुकान का नाम नहीं होता.
वह उन लोगों का नाम होता है, जिनकी यादें मिट्टी में रहती हैं.
अब मैं भी बूढ़ा हो गया हूं.
मेरी दीवारों का चूना झड़ रहा है.
कुछ खिड़कियां बंद हो गई हैं.
मेरे बरामदे में पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही.
मेरे कमरे अब कम खुलते हैं.
कभी कोई वर्तमान या पूर्व विधायक बैठक करना चाहता है, तो मेरे दरवाजे फिर खुल जाते हैं.
कभी कोई राजनीतिक कार्यक्रम या मुलाकात होती है, तो मेरे पुराने बरामदे को फिर लोगों की आवाजें मिल जाती हैं.
अब यहां पहले की तरह खाना और चाय नहीं बनती.
जो चाहिए, बाहर से आता है.
मेरा पुराना चौकीदार भी नहीं है.
उसकी चाबी अब किसी और के पास है.
कभी-कभी कोई बच्चा मेरे आंगन में आकर पूछता है—
“यह पुराना मकान किसका है?”
मैं मन ही मन मुस्कुरा देता हूं.
किसी का नहीं हूं मैं.
और शायद पूरे कस्बे का हूं.
मेरे आसपास भी बहुत कुछ बदल गया है.
मेरी जमीन की सीमाएं भी अब पहले जैसी साफ नहीं रहीं.
समय के साथ कुछ हिस्सों पर दूसरे निर्माण दिखाई देने लगे हैं.
मैंने इस कस्बे के अधिकारियों को आते-जाते देखा है.
कई नेताओं को यहां से जुलूस शुरू करते देखा है.
कुछ को चुनाव जीतने के बाद देखा.
कुछ को मंत्री बनने के बाद लौटते देखा.
जनता दरबार लगते देखे.
लोगों को अपनी शिकायतें लेकर आते देखा.
किसी की आंखों में उम्मीद देखी.
किसी के चेहरे पर नाराजगी.
किसी को काम मिलते देखा.
किसी को वर्षों तक इंतजार करते देखा.
मैंने यहां बहुत कुछ देखा है.
इतना कि अगर बोलना शुरू कर दूं, तो शायद कई रातें कम पड़ जाएं.
लेकिन मैंने अब तक बहुत कम बोला.
क्योंकि मैं डाक बंगला हूं.
मेरी आदत है…
देखना.
सुनना.
याद रखना.
और चुप रहना.
लेकिन अब शायद चुप रहने का समय खत्म हो गया है.
अब मैं तुम्हें अपनी कहानियां सुनाऊंगा.
एक-एक करके.
उन लोगों की कहानियां, जो कभी मेरे सामने से गुजरे.
उन रिश्तों की कहानियां, जिन्हें मेरी खिड़कियों ने जन्म लेते और टूटते देखा.
उन रास्तों की कहानी, जो कच्चे से पक्के हुए.
उन खेतों की कहानी, जो धीरे-धीरे घरों में बदल गए.
उन आवाजों की कहानी, जो समय के साथ कहीं खो गईं.
और उन लोगों की कहानी, जिनके जाने के बाद भी उनकी यादें मेरे किसी कमरे, किसी खिड़की, किसी पेड़ या किसी फूल की क्यारी में रह गईं.
इसीलिए इस सिलसिले का नाम है—
36 शख्स… 36 कहानियां
ये सिर्फ 36 लोगों की कहानियां नहीं होंगी.
ये इस कस्बे की 36 यादें होंगी.
36 चेहरे होंगे.
36 जिंदगी होंगी.
36 ऐसे किस्से होंगे, जिनमें शायद आपको अपना कोई जाना-पहचाना चेहरा दिखाई दे.
कभी कोई चौकीदार होगा.
कभी कोई किसान.
कभी कोई शिक्षक.
कभी कोई दुकानदार.
कभी कोई ऐसा आदमी, जिसे पूरा कस्बा जानता था.
और कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम शायद अब बहुत कम लोग याद करते हैं.
लेकिन मैं उसे भूला नहीं हूं.
क्योंकि वह कभी मेरे सामने से गुजरा था.
कभी मेरे बरामदे में बैठा था.
कभी मेरी दीवार से टिककर रोया था.
कभी हंसा था.
कभी किसी का इंतजार किया था.
और कभी अपनी कोई कहानी मेरी खामोशी के हवाले कर गया था.
मैं उन कहानियों को फिर से उठाऊंगा.
धूल झाड़ूंगा.
और तुम्हारे सामने रख दूंगा.
शायद उनमें तुम्हारा बचपन मिले.
शायद तुम्हारे पिता का चेहरा.
शायद तुम्हारे दादा की आवाज.
शायद वह दोस्त, जो कभी अचानक शहर चला गया था.
शायद वह लड़की, जिसकी डोली तुम्हारी गली से निकली थी.
या शायद वह आदमी, जिसके बारे में तुम्हें लगा था कि उसकी कहानी कभी कोई नहीं सुनेगा.
मैं सुनाऊंगा.
क्योंकि मैंने देखा है.
और जो मैंने देखा है, उसे भुलाना मेरे लिए आसान नहीं.
इसलिए…
आओ.
कल फिर मेरे बरामदे में बैठना.
मैं तुम्हें अपने कस्बे के ऐसे व्यक्ति की कहानी सुनाऊंगा…जो मेरी स्मृति में है…
और हां…
अगर आपकी स्मृति में भी इस कस्बे के किसी व्यक्ति की कोई कहानी है. कोई भूला हुआ चेहरा, कोई किस्सा, कोई रिश्ता, कोई घटना, कोई ऐसा इंसान जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए—तो उसे हमारे साथ साझा कीजिए.
आपकी याद को हम कहानी का रूप देंगे.
क्योंकि यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है.
यह हम सबकी स्मृतियों का सिलसिला है.
36 शख्स… 36 कहानियां.
एक बूढ़े डाक बंगले की आंखों से देखा हुआ हमारा कस्बा.
