
उषा कंसल, बैंगलोर (पूर्व प्रवक्ता हिंदी इंटर कॉलेज हरिद्वार, उत्तराखंड)
आज उमा बहुत प्रफुल्लित थी। करवा चौथ के अवसर पर वह कचौरियाँ और गोभी की सब्ज़ी विद्यालय लेकर आई। उसने सोचा था कि यामिनी यह सब खाकर बहुत प्रसन्न होगी। मध्यांतर में जब वह स्टाफ रूम में पहुँची और अपने लंच बॉक्स को उठाने का प्रयास किया, तो वह हल्का लगा। वह हैरान रह गई। सामने यामिनी बैठी हुई थी।
उमा को उलझन में देखकर वह ज़ोर से हँस पड़ी। बोली, “तुम्हारे लंच बॉक्स से कचौरियाँ और गोभी की सब्ज़ी तो मैं चतुर्थ कालांश में ही खा चुकी। कल करवा चौथ था, इसलिए मुझे पता था कि तुम यह सब लेकर ही आओगी। अब मेरी आलू-पूरी तुम खा लो।”
मेरी प्यारी सखी के साथ मेरा रिश्ता बहन-तुल्य मित्रता का है। वह अपनी सखियों के लिए दही-बड़े, पनीर पुडिंग तथा अन्य विशिष्ट व्यंजन बनाकर लाती। घर ले जाने के लिए भी वही सामान मेरे लिए अवश्य लाती।
एक बार उसके घर बीस किलो कच्चे आम आए। उन्हें काटते-काटते उसके हाथों में छाले पड़ गए। उसने मुझे फोन किया और बोली, “मैं सारे आम तुम्हारे पास भेज रही हूँ। कुछ कट चुके हैं, कुछ बिना कटे हैं। प्लीज़, इन्हें काटकर अचार डाल दो—कुछ मीठा, कुछ हींग वाला और कुछ कम तेल वाला खट्टा अचार।”
हम एक-दूसरे को मानवीय धरातल पर पूरी तरह समझते हैं। हर संभव कार्य में एक-दूसरे का सहयोग भी करते हैं।
उसे कोई लाभप्रद बात, कोई उपयोगी काम या घरेलू चिकित्सा की जानकारी मिलती है, तो वह तुरंत मुझे बताती है। इसी प्रकार मैं भी कोई अच्छी जानकारी मिलते ही उसे अवश्य बताती हूँ। आज वह हरिद्वार में रहती है और मैं बच्चों के साथ बेंगलुरु में। दूरी बढ़ गई है, लेकिन हमारे स्नेह में कभी कोई दूरी नहीं आई। हम एक-दूसरे की घनघोर प्रशंसक और सच्ची शुभचिंतक हैं।
मैंने उससे जीवन की अनेक छोटी-छोटी, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण बातें सीखी हैं। वह अक्सर कहती है, “खाना मुँह में कुछ सेकंड रहता है, लेकिन पेट में कई घंटे। इसलिए जीभ की नहीं, पेट के लाभ-हानि की सोचनी चाहिए।“ वह यह भी कहती है, “जब हम किसी को खाना खिलाएँ, तो इस तरह खिलाएँ कि खाने वाले को सचमुच आनंद आए।”
हम दोनों सहकर्मी रहे हैं और हिंदी प्रवक्ता के रूप में साथ कार्य किया है। हमारी मित्रता केवल सहकर्मिता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह विश्वास, अपनत्व, सहयोग और आत्मीयता का ऐसा संबंध बन गई, जो समय और दूरी की हर परीक्षा में आज भी उतना ही सशक्त है।
