
ममता सिंह, अहमदाबाद ( गुजरात)
हमारी पीढ़ी ने जब इस संसार में आँखें खोलीं, तब चारों ओर परम्पराओं का एक अभेद्य पहरा था। सही और ग़लत का निर्णय करने का अधिकार हमें नहीं दिया गया; जो था, वही अंतिम सत्य था। उसी को वैभव मानकर, उसी साँचे में हमें ढाला गया।
प्रश्न पूछना अनुशासनहीनता व तर्क करना उद्दंडता माना जाता था ।
और ग़लत को ग़लत कहना लगभग अपराध ।
हमारा जितना अधिक सिर झुकता, हमारे अभिभावकों का सीना उतने ही गर्व से चौड़ा होता। हमारी मूक स्वीकृति को हमारे संस्कारों का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र माना जाता था।
हम ऐसे उदाहरण सुनते हुए बड़े हुए कि राम ने केवल पिता की आज्ञा के लिए चौदह वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। सीता ने पति की मर्यादा के साथ स्वयं ही वनवास चुना। उर्मिला से तो पूछा तक नहीं गया कि जिनके साथ उनका जीवन बंधा था, वे उन्हें यह बताना भी आवश्यक नहीं समझ पाए कि वे जा रहे हैं।
इन कथाओं को पूजा मानते हुए भी, हमारे भीतर प्रश्नों का एक अनवरत कोलाहल चलता रहता था।
हम पूछना चाहते थे, क्या पिता के निजी निर्णय का भार पुत्र का धर्म बन जाना ही आदर्श है? क्या राम के पास ‘ना’ कहने का कोई अधिकार नहीं था? क्या सीता केवल प्रतीक्षा और त्याग का ही दूसरा नाम थीं? क्या वे स्वयं राज्य नहीं संभाल सकती थीं? और उर्मिला… क्या उनकी सहमति, उनकी पीड़ा, उनके अधिकार किसी कथा के योग्य भी नहीं थे?
पर हमने कुछ नहीं पूछा।
हमने अपने प्रश्नों को अपने ही भीतर दफना दिया और उन्हें ही अपना संस्कार मान लिया।
फिर समय बदला। हमने संघर्ष किया। घर भी संभाला, बाहर भी अपनी पहचान बनाई। जीवन की धूप-छाँव में चलते हुए हमने यह समझ लिया कि सबसे बड़ा अन्याय केवल अधिकार छीन लेना नहीं, बल्कि किसी की आवाज़ छीन लेना होता है।
शायद इसी कारण हमने अपने बच्चों को वह देने का प्रयास किया जो हमें कभी नहीं मिला।
हमने उन्हें बोलना सिखाया।
हमने उन्हें प्रश्न पूछने का साहस दिया।
हमने उन्हें तर्क करना सिखाया।
हमने उन्हें यह विश्वास दिया कि सम्मान और असहमति एक साथ चल सकते हैं।
आज जब बच्चे अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर खड़े होते हैं, जब वे अपनी बात निर्भीक होकर कहते हैं, जब उनके साथ उनके माता-पिता भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई देते हैं, तब भीतर कहीं एक अनकही तृप्ति जन्म लेती है। लगता है कि हमारी पीढ़ी की चुप्पियाँ व्यर्थ नहीं गईं,वे अगली पीढ़ी की आवाज़ बनी हैं।
यह भी सच है, उनकी मुखरता हमें असहज भी करती है। वे हमसे भी प्रश्न करते हैं, हमारे निर्णयों को भी चुनौती देते हैं। पर शायद यही वह भविष्य है, जिसकी नींव हमने अपने अधूरे सपनों और दबे हुए प्रश्नों पर रखी थी।
कौन कहता है कि हमारी पीढ़ी अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दे पाई?
हमने उन्हें केवल आज्ञाकारी नहीं बनाया,
हमने उन्हें विचारवान बनाया।
हमने उन्हें केवल सिर झुकाना नहीं,
सिर उठाकर सच कहना भी सिखाया।
हमने अपने बच्चों को बोलना सिखाया है ।
क्या यह कम है ?

बहुत सही कहा, ममता आपने।
धन्यवाद नीरजा जी 🌼
यह क्या कम है ? सुश्री ममता सिंह द्वारा लिखा लेख पढ़ा और लगा जैसे हमें अपने अंदर झाँकने का द्वार खुल गया , चिन्तनीय है यह बात , जब मेरे पति कहते हैं हम अपने पिता के सामने बोल नहीं सकते थे . तब वे गर्व करते हैं । हम गर्व करते हैं । परंतु आज ममता के लेख में वातायन खोला है और उसमें से झांक कर देखा तो पता चल रहा है कि , आँख बंद करके आदेश मान लेना , संसकार का पर्याय नहीं है , हम ये नहीं कहते कि उद्दण्ड होना चाहिए किंतु आँख खोल कर दायें बायें देखकर निर्णय लेना आवश्यक है ।
यह पीढ़ी वोही कर रही है !
एक बहुत सुंदर लेख के लिए ममता सिंह को बहुत बधाई ।
आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है। बच्चों का बोलना उद्दंडता नहीं बल्कि स्वतंत्रता और बुद्धिमत्ता से अपनी बात को रखना है
ममता, बहुत खूब लिखा , आपने बहुत सुंदर और सार्थक लेख
एक महत्वपूर्ण विषय पर सहज भाषा में लिखा सोचनीय आलेख। बधाई ममता जी!
Mamtaji, बहुत सुंदर एवं सार्थक लेख
शब्दों का चयन, बधाई🥰
आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है। बच्चों का बोलना उद्दंडता नहीं बल्कि स्वतंत्रता और बुद्धिमत्ता से अपनी बात को रखना है
Bahut sundar sateek, lekh.. 👍🙏