
. रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
प्रेम हमेशा आँखों से शुरू नहीं होता. कुछ प्रेम ऐसे भी होते हैं, जो पहली मुलाकात से पहले ही आत्माओं में लिख दिए जाते हैं. कुछ लोग हमारी जिंदगी में ऐसे आते हैं, जैसे हम उन्हें बरसों से जानते हों. उनकी आवाज़ अनजानी नहीं लगती, उनका दुख अपना-सा लगता है और उनकी मुस्कान हमारे भीतर फूलों की तरह खिल उठती है.
यही रूहानी प्रेम है.
एक ऐसा प्रेम, जिसमें दो लोग एक-दूसरे को पाने की नहीं, बल्कि महसूस करने की चाह रखते हैं. जहाँ हाथों का स्पर्श जरूरी नहीं होता, क्योंकि आत्माएँ पहले ही एक-दूसरे को छू चुकी होती हैं.
रूहानी प्रेम में किसी का नाम सुनकर दिल की धड़कन बदल जाती है. बिना किसी संदेश के भी मन बेचैन हो उठता है, जैसे कहीं दूर कोई हमें याद कर रहा हो. रात की खामोशी में अचानक किसी की मौजूदगी महसूस होना, बिना वजह मुस्कुरा देना, किसी अनजाने दर्द में आँखों का भर आनाये सब उसी प्रेम की निशानियाँ हैं.
यह प्रेम इश्क़ का वह मुकाम है, जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं और खामोशियाँ इबादत बन जाती हैं.
सू़फी संत कहते हैं कि कुछ आत्माएँ जन्मों से एक-दूसरे की तलाश में होती हैं. जब वे मिलती हैं, तो पहचानने के लिए परिचय की आवश्यकता नहीं पड़ती. वे एक-दूसरे को आँखों से नहीं, एहसास से पहचान लेती हैं.
रूहानी प्रेम में दूरी का कोई अर्थ नहीं होता.
दो लोग हजारों किलोमीटर दूर रह सकते हैं, लेकिन उनकी रूहें हर पल एक-दूसरे के साथ होती हैं. एक की बेचैनी दूसरे की नींद चुरा लेती है. एक की खुशी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान बनकर उतर आती है.
यह प्रेम अधिकार नहीं चाहता, बस दुआ बनकर साथ चलता है.
यह प्रेम कहता नहीं कि तुम मेरे हो, बल्कि धीरे से फुसफुसाता है….जहाँ भी रहो, खुश रहो मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ हैं. रूहानी प्रेम में चाहत का सबसे सुंदर रूप समर्पण होता है. यहाँ किसी को बदलने की इच्छा नहीं होती, बल्कि उसे उसकी कमियों और खूबियों सहित स्वीकार कर लेने की क्षमता होती है.
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि रूहानी प्रेम में दो लोग एक नहीं हो पाते. परिस्थितियाँ, दूरियाँ, समय या जीवन उन्हें अलग राहों पर ले जाते हैं. लेकिन फिर भी उनका प्रेम समाप्त नहीं होता. क्योंकि रूहानी प्रेम साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि दिल में बसे रहने का नाम है.कुछ लोग हमारी जिंदगी से चले जाते हैं, पर हमारी रूह से कभी नहीं जाते.
वे दुआ बनकर रह जाते हैंकभी किसी गीत में,कभी किसी बारिश में,कभी किसी शाम की उदासी में,तो कभी किसी मुस्कान के पीछे छिपी याद में.
रूहानी प्रेम दरअसल प्रेम का सबसे पवित्र रूप है. यह दो शरीरों का नहीं, दो आत्माओं का मिलन है. इसमें इश्क़ धीरे-धीरे इबादत बन जाता है और प्रिय व्यक्ति, खुदा के सबसे खूबसूरत उपहार की तरह महसूस होने लगता है.
शायद इसलिए कहा जाता है.कुछ लोग हमारे हिस्से में नहीं होते, लेकिन हमारी रूह के हिस्से में ज़रूर होते हैं.और जब दो आत्माएँ सचमुच एक-दूसरे को पहचान लेती हैं, तब प्रेम केवल एक रिश्ता नहीं रहता, वह एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता हैएक ऐसा अनुभव, जो समय, दूरी और मृत्यु की सीमाओं से भी परे होता है.यही रूहानी प्रेम है एक ऐसा इश्क़, जो दिल से शुरू होकर रूह में बस जाता है और फिर कभी खत्म नहीं होता.
