
झरना माथुर
नौ दिन की है आग रे, होना नहीं निराश।
भीषण गर्मी रैन दिन, होना नहीं हताश।।
दिनकर देखे यूं धरा, सीधी उसकी चाल।
सूनी सड़के हो गई,गर्मी से बेहाल।।
लू की टेड़ी चाल रे,मुंह पे मारे मार।
ऐसी कूलर ठप हुए, उनकी होती हार।।
नींबू पोदीना भले,कैरी पन्ना खास।
खरबूजा तरबूज से, मिटती सबकी प्यास।।
उल्टे – पुल्टे से बचो, खाने का रख ध्यान।
हल्का- फुल्का ही सही, उससे तेरी शान।।
