यादों का सफर

सूर्यास्त के समय एक साथ बैठे दोस्तों का समूह हँसते-बतियाते हुए, दोस्ती और अपनापन दर्शाता दृश्य।

अर्चना ज्ञानी, उज्जैन

यूँ ही ख्यालों में डूबी थी आज,
कि अचानक एक संदेश आया।
आँखें नम हो गईं, ये जानकर
कि मैंने भी कुछ अनमोल कमाया।

फिक्रमंद है कोई, ये सोचकर
दिल भर आया।
और इसलिए ये सब बयां करने का
मैंने मन बनाया।

ना खून का कोई रिश्ता,
ना भाग्य का कोई बंधन।
जीवन की इस राह में फिर भी
तुमसे मिला वो अपनापन।

हमउम्र नहीं थे सब,
कुछ छोटे और कुछ बड़े।
वो निश्छल स्नेह ही था
कि हमारे दिल के तार तुमसे जुड़े।

जब-जब छलके आँसू,
तब-तब तुम्हें अपने पास पाया।
‘तुम ठीक हो’ इन शब्दों ने
मेरे हर गम को भुलाया।

हँसते-हँसाते, नाचते-गाते,
मुझे हर पल जीना सिखाते।
पता नहीं ऐ दोस्तों,
वक्त कब गुज़र गया
तुम्हारे साथ चलते-चलते।

कुछ रिश्तों में दोस्त मिले,
तो कुछ दोस्तों से रिश्ते बने।
शुक्रगुज़ार है दिल सभी का,
जो आप मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बने।

हर साथी से जुड़ी हैं
कुछ बेहद खास यादें।
सलामत रहे दोस्ती हमारी,
कभी न टूटे प्रेम के ये धागे।

तुम दूर हो या पास,
हम हरदम साथ निभाएँगे।
जब-जब तुम्हें खुशियाँ मिलेंगी,
हम भी यहाँ मुस्कुराएँगे।

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