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फूलों की गुफ़्तगू…

कविता सिंह, लेखिका, कानपुर

फूलों ने हमसे कुछ हल्की-सी गुफ़्तगू की,
हवा में घुली उनकी ख़ुशबू ने रूह को छु ली।

हमने भी दिल का एक पन्ना खोलकर रख दिया,
जो राज़ बरसों से चुप था, उसे बोलकर रख दिया।

पर कमबख़्त देखो, क्या करिश्मा हुआ उस पल,
हमारी हर बात पर झूम उठे वो महकते दिलक़श कल।

हमने सोचा था, बस सुना कर आगे बढ़ जाएँगे,
पर फूल भी क्या ख़ूब थे—हम पर ही मर जाएँगे।

अब जब भी बगिया से गुज़रते हैं, महसूस होती है धड़कन,
लगता है जैसे हर कली में बसता है हमारा ही दर्पण।

ये कैसा प्यार है जो रंगों में ढला रहता है
फूल हमारे क़दमों की आहट पर भी मुस्कराता रहता है

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