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दूरी के साये

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर

राजकुमार जोशी स्कूल में गणित के बहुत अच्छे शिक्षक थे। स्कूल से लौटने के बाद भी उनके घर ट्यूशन पढ़ने वालों की लंबी कतार लगी रहती थी. छोटा-सा परिवार पत्नी संध्या और दो बेटियाँ।दोनों बेटियाँ पढ़ाई में बहुत तेज़ थीं और हमेशा गणित में टॉप करती थीं। जोशी जी का सपना था कि उनकी दोनों बेटियाँ MCA करें और बड़ी कंपनियों में नौकरी पाएँ। जैसा उन्होंने चाहा, वैसा ही हुआ. दोनों ने MCA में टॉप किया और अच्छी कंपनियों में उनका चयन हो गया।

लेकिन जोशी जी के मन में एक और बड़ा सपना था.उनकी बेटियाँ विदेश जाएँ और उनका नाम रोशन करें।
बड़ी बेटी के लिए विदेश से जॉब ऑफर आने लगे और कई रिश्ते भी आए। अंत में उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का विवाह एक NRI लड़के से कर दिया। वे बहुत खुश थे। कुछ वर्षों बाद छोटी बेटी की शादी भी विदेश में ही एक NRI लड़के से कर दी गई। जोशी जी को लगा कि उनके सारे सपने पूरे हो गए।

बेटियों के पास जाते और वापस लौट आते.समय गुजरता रहा। धीरे-धीरे संध्या जी के शरीर में कई बीमारियाँ घर करती गईं। उनका वज़न 105 किलो तक हो गया और शरीर साथ नहीं देता था। घर और संध्या जी की देखभाल का सारा बोझ जोशी जी के कंधों पर आ गया। उम्र ढल रही थी, मगर सहारे के लिए कोई नहीं था।दोस्त कई बार कहते-“जोशी जी, काश एक बेटी को भारत में ही रहने देते। कम से कम ज़रूरत के समय मदद तो मिलती।”
लेकिन अब पछताने से क्या होता?

एक दिन संध्या जी काम करते-करते फिसल गईं, और वजन ज्यादा होने की वजह से उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया। 75 साल के जोशी जी अकेले ही उन्हें एम्बुलेंस से नज़दीक के अस्पताल ले गए।
दीवाली का दिन था.अस्पतालों में कम स्टाफ और घर में कोई मदद नहीं। एक दोस्त रोज़ आकर उनका साथ देता रहा। संध्या जी का ऑपरेशन हुआ और दस दिन अस्पताल में रहने के बाद वे वापस घर आ गईं। जोशी जी ने उनकी पूरी सेवा की।

बेटियाँ उन्हें USA बुलाना चाहती थीं। जोशी जी ने जाने के लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, पर वीज़ा में समय और पैसा दोनों लग रहा था। फिर भी कोशिश जारी थी।

कुछ दिनों बाद वे रूटीन चेकअप के लिए पास के शहर गए। संध्या जी ठीक-ठाक ही थीं, लेकिन अचानक अस्पताल में ही उन्हें चक्कर आया और वे बेहोश हो गईं। डॉक्टर उन्हें तुरंत आपातकालीन कक्ष में ले गए।
कई बीमारियों से जूझ रहे शरीर ने साथ छोड़ दिया. संध्या जी को हार्ट अटैक हुआ और जोशी जी के सामने ही उनका देहांत हो गया।

75 साल के अकेले बूढ़े जोशी जी का रो-रोकर बुरा हाल था। न बेटियाँ पास थीं, न रिश्तेदार, न कोई और सहारा।
हिम्मत जुटाकर उन्होंने बेटियों और दोस्तों को फोन किया। बेटियाँ बुरी तरह टूट गईं, लेकिन इतनी दूरी!
तुरंत पहुँचना संभव नहीं था.कम से कम 3–4 दिन का समय लगना तय था।

जोशी जी ने अस्पताल में संध्या जी के पार्थिव शरीर को फ्रीज़र में रखवाया और खुद घर लौट आए.बेटियों के इंतज़ार में।

इन तीन दिनों में कुछ पड़ोसी और एक-दो दोस्त साथ थे, बस इतना ही सहारा। तीसरे दिन बड़ी मुश्किल से दोनों बेटियाँ पहुँचीं। न दामाद आ पाए, न कोई नाती-पोता।

संध्या जी का अंतिम संस्कार बेटियों के आने के बाद ही हो सका।

अब आगे का जीवन कैसे गुज़रेगा. जोशी जी खुद भी नहीं जानते।
बेटियों के पास जाना उनके लिए आसान है, लेकिन दिल का खालीपन कौन भरे?

2 thoughts on “दूरी के साये”

  1. बच्चो से करते फरियाद हम देश छोड़ न जावो जी
    अपने माता पिता को जीते जी नर्क नही पहुंचाओ जी 🙏

  2. बहुत सुंदर लेख हमारी प्रिय लेखिका रक्षा उपाध्याय की कहानिया हमेशा आज की सामाजिक अस्थिरता को रेखांकित करती है आज ऐसे कही परिवार है जो बच्चों के उज्वल भविष्य बनाने में वृद्धा अवस्था में असहाय हो जाते हैं कई बार बेटे बेटियां सात समंदर पार होने से उनके मृत्युपर्यन्त के दायित्व या तो पड़ोसी या मोहल्ले के लोग या कोई सामाजिक संस्था निभाती हैं विडंबना हे

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