जन्‍म नहीं दोगी मुझको?

एक अजन्मी बच्ची अपनी माँ से प्रश्न करती है—“माँ, मैं भी तो तुम्हारा ही अंश हूँ, फिर क्यों मुझे जन्म नहीं दोगी? मेरा कसूर क्या है?” वह कहती है कि उसने अब तक न तो सूरज की रोशनी देखी है, न फूलों का खिलना, न चिड़ियों की चहक सुनी है। धरती पर कदम रखने से पहले ही उसे बोझ मान लिया गया है।

वह माँ से निवेदन करती है कि उसे एक बार दुनिया में आने का अवसर मिले। वह भरोसा दिलाती है कि कभी माँ पर बोझ नहीं बनेगी, बल्कि नाम रोशन करेगी। वह सानिया मिर्ज़ा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, साइना नेहवाल और प्रतिभा पाटिल जैसी महान महिलाओं का उदाहरण देती है और कहती है कि वह भी वैसा ही बनकर दिखा सकती है।

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अजन्‍मी बेटी के सवाल

यह कविता एक अजन्मी बेटी की मार्मिक पुकार है, जो अपनी मां से सवाल करती है कि उसने जन्म से पहले ही उसकी जीवन-रेखा क्यों मिटा दी। वह बताती है कि वह तो मां की धड़कन भर थी, फिर भी उसे क्यों बोझ समझा गया। बेटे की चाह में मां ने समाज के उसूलों को मान लिया, पापा और दादी की तरह उसने भी बेटी के आने को नापसंद किया। वह कल्पना करती है कि अगर उसे जन्म मिला होता, तो वह सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, साक्षी मलिक या पी. वी. सिंधु जैसी बनकर मां का नाम रोशन कर सकती थी। अंत में, वह कहती है कि अगर मां ने थोड़ा सा प्यार दिया होता, तो वह अपना पूरा जीवन मां की सेवा और सपनों को पूरा करने में लगा देती, लेकिन उसकी इच्छाओं को अनदेखा कर दिया गया। यह रचना बेटियों के प्रति समाज में फैली कुप्रथाओं और भ्रूण हत्या पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

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