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ये क्या हुआ

यह कविता उस कटु सच्चाई पर चोट करती है, जहाँ विचार और कलम दोनों की नीलामी होने लगी है। जहाँ डर और लालच ने उन लोगों को भी झुका दिया, जो कभी सिद्धांतों के आसमान हुआ करते थे। आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सच बोलने वाले लोग ही गायब हो गए हैं और जिन्हें समाज की आत्मा माना जाता था, वही बिक चुके हैं। अब सवाल सिर्फ़ यही है ये सिलिसिला किसने शुरू किया? और कब तक चलता रहेगा?

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