जन्‍म नहीं दोगी मुझको?

एक अजन्मी बच्ची अपनी माँ से प्रश्न करती है—“माँ, मैं भी तो तुम्हारा ही अंश हूँ, फिर क्यों मुझे जन्म नहीं दोगी? मेरा कसूर क्या है?” वह कहती है कि उसने अब तक न तो सूरज की रोशनी देखी है, न फूलों का खिलना, न चिड़ियों की चहक सुनी है। धरती पर कदम रखने से पहले ही उसे बोझ मान लिया गया है।

वह माँ से निवेदन करती है कि उसे एक बार दुनिया में आने का अवसर मिले। वह भरोसा दिलाती है कि कभी माँ पर बोझ नहीं बनेगी, बल्कि नाम रोशन करेगी। वह सानिया मिर्ज़ा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, साइना नेहवाल और प्रतिभा पाटिल जैसी महान महिलाओं का उदाहरण देती है और कहती है कि वह भी वैसा ही बनकर दिखा सकती है।

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जरा-ज़रा तू हमसे मिल

मन बार-बार उस प्रिय को पुकारता है—“जरा-सा मिलो, तनिक-सा मेरे दिल में उतर आओ।” आँखें जो कहती हैं, वही शब्दों से सुनना चाहता है। सपनों में बीती रातें और अंतस की अनकही बातें, सब उसी से जुड़ी हैं। उसका साथ वेदना हर लेता है, उसके अधरों की मुस्कान अमृत बरसाती है। यदि मिल न पाए तो हृदय तड़प-तड़प कर व्याकुल हो उठता है। अब तो चाह यही है कि वह बिना दस्तक इस जीवन में आ बसे, और परिणय के बंधन में सब कुछ स्थिर हो जाए। उसकी आँखों की गहराई में डूब जाना मानो किसी झील में समा जाना है।

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