gulmohar

मकाँ

एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।

Read More

अब मैं खाली हूँ…

भावनात्मक टूटने और भीतर के खालीपन को मार्मिक ढंग से चित्रित है। शुरुआत में बहुत समझाने, सवाल करने और दूरी मिटाने की कोशिश की, लेकिन समय के साथ शब्द थक गए, मन बुझने लगा और शिकायतें भीतर ही दब गईं। अब उसके दिन रसोई की भाप, बरामदे की धूल और घड़ी की टिक-टिक में गुजरते हैं—साथी के साथ नहीं, बल्कि अकेलेपन में।
जब साथी पुरानी यादों और अधूरे वादों के साथ लौटता है, तो भीतर कोई उत्साह या उम्मीद नहीं जागती। आँगन का चाँद, दीपक और हथेलियों का उजाला बहुत पहले खो चुके हैं। वक्ता अब खुद को एक खाली घर मानती है, जहाँ साथी महज़ मेहमान है और प्रेम एक पुरानी वस्तु बनकर कहीं सुरक्षित रख दिया गया है।

Read More