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” बाऊजी “

बाऊजी को रिटायर हुए पंद्रह साल बीत चुके थे। माँ के जाने के बाद उनकी दुनिया जैसे सूनी पड़ गई थी, इसलिए मैं उन्हें दिल्ली से मुंबई अपने पास ले आया। हर संभव सुविधा देने की कोशिश करता रहा दवाइयाँ, ताज़ा फल, सुख-सुविधाएँ पर बाऊजी का मन हमेशा उसी पुराने घर में अटका रहता जहाँ माँ की यादें थीं। एक सुबह दूध की एक गिलास ने सब कुछ उजागर कर दिया. दूध में पानी, और मेरे हिस्से में शुद्ध दूध। पापा के सामने मेरा सिर झुक गया। उन्होंने बात को हँसकर टाल दिया, पर उनके स्वर की कंपकंपाहट मेरे मन पर चुभ गई।

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एक प्रश्न

शर्मा जी ने जीवन की पूरी कमाई दो बेटों में बाँट दी, पर बदले में एक कमरा तक न मिला। किराए के मकान में रहने वाले शर्मा जी सुबह का खाना बड़े बेटे और शाम का खाना छोटे बेटे के यहाँ खाकर लौट आते। यह दिनचर्या उनके दस वर्षीय पोते निखिल से छिपी नहीं थी। एक दिन वह मासूमियत से पूछ बैठा. “पापा, जब आप बूढ़े हो जाएँगे… तो दूसरे वक्त का खाना कहाँ खाएँगे

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