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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

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स्त्री मन

एक स्त्री का मन बेहद संवेदनशील और मजबूत होता है। किसी के चले जाने का एहसास उसे अंदर से हिला देता है, लेकिन वही स्त्री अपनी पीड़ा को सहकर अपने अपनों के लिए जीवित रहती है। अकेलेपन और खामोशियों के बीच भी वह निरंतर प्रयास करती है, असंभव को संभव बना देती है, और छल जाने पर भी दूसरों के लिए दुआएँ देती है। स्त्री का मन भावनाओं और बलिदान का प्रतीक है।

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अस्तित्व…

अस्तित्व की खोज में वह खुद से बार-बार टकराती है। कभी सपनों में, कभी आकांक्षाओं में, तो कभी शब्दों की परछाइयों में अपने होने का अर्थ तलाशती है। वह अपने भीतर दबे सवालों को सुनती है—”कौन हूँ और क्या हूँ मैं?” और हर बार यह अहसास होता है कि उसका वजूद अभी अधूरा है। यही अधूरापन उसे फिर से जगाता है, नव-कोंपलों-सा उगाता है। अंततः वह अपने भीतर एक ऐसा वृक्ष देखती है, जो अपनी जड़ों से अनगिनत संभावनाएँ पोषित करता है। यही उसका नया अस्तित्व है—सशक्त, गहन और अडिग।

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