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शिक्षण संस्थान बन रहे मौत के घर

देश के कई शिक्षण संस्थान छात्रों के लिए बेहतर जीवन जीने के पाठ सीखने की जगह कम, मौत के घर ज्यादा बनते जा रहे हैं।

छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं समाज की उम्मीदों और नियमों के नीचे दबी खामोश पीड़ा के संकेत हैं।बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता है कि असफलता, निराशा या अनिश्चितता से कैसे निपटना है। उन्हें सिर्फ परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाता है, जिंदगी के लिए नहीं।

 इन घटनाओं को अब नजर अंदाज नहीं किया सकता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से कई बार हिदायतें दी जाती रही हैं लेकिन इस समस्या का समाधान अभिभावक और शिक्षण संस्थानों को भी मिल कर खोजना होगा। क्योंकि मुफ्त में युवा जानें जा रही हैं।

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