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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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