तुम्हारा–मेरा प्रेम
उस प्रेम की कथा कहती है जो शब्दों का मोहताज नहीं होता। आँखों की गहराइयों में ठहरा, निःस्वार्थ और समान पीड़ा में बंधा यह प्रेम मोगरे की सुगंध की तरह मन में सहेजा रहता है धीरे-धीरे फैलता हुआ, आज भी अव्यक्त, फिर भी अटूट और अभेद्य।

उस प्रेम की कथा कहती है जो शब्दों का मोहताज नहीं होता। आँखों की गहराइयों में ठहरा, निःस्वार्थ और समान पीड़ा में बंधा यह प्रेम मोगरे की सुगंध की तरह मन में सहेजा रहता है धीरे-धीरे फैलता हुआ, आज भी अव्यक्त, फिर भी अटूट और अभेद्य।