वैलेंटाइन डे जरूरी नहीं, रोज़ के छोटे पल ही बनाते हैं मजबूत रिश्ता

वैलेंटाइन डे जरूरी नहीं, प्यार रोज़ होना चाहिए

महंगे गिफ्ट और सोशल मीडिया दिखावे से हटकर आज के कपल्स प्यार को नए तरीके से जी रहे हैं. माइक्रो रोमांस यानी रोज़मर्रा के छोटे-छोटे पल अब मजबूत रिश्तों की असली पहचान बन रहे हैं. जानिए क्यों सुरक्षित और सच्चे प्यार को वैलेंटाइन डे की जरूरत नहीं होती.

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चन्दन की चांदनी

चांदनी का यह पहला करवा चौथ था, लेकिन उसका पति चन्दन उसके साथ नहीं था। शादी को अभी साल भी पूरा नहीं हुआ था और चंदन को हेड ऑफिस के बुलावे पर अपनी ड्यूटी पर जाना पड़ा। उदास चांदनी को सासुमा ने प्यार से समझा-बुझाकर नई लाल सिल्क साड़ी और गहने दिलवाए।
जब चांद निकला, चांदनी ने छलनी से उसे देखा और अपने पति की याद में मनुहार की। तभी सही वक्त पर वीडियो कॉल आया — चंदन मुस्कुराते हुए सामने था। खुशी और प्यार से भरी यह पल सभी सुहागिनों के लिए भी आनंदमय था। सासू मां ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “इन्हें किसी की नज़र न लगे, इनके बीच अटूट प्यार बना रहे।”

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प्रेमपत्र से वंचित लेखक

यह लेख एक हास्य-व्यंग्य शैली में लिखा गया आत्मकथन है, जिसमें लेखक अपनी असफलता का कारण मज़ाकिया अंदाज़ में पत्नी को ठहराते हैं। वह बताते हैं कि जवानी में यदि पत्नी ने उनके प्रस्ताव पर तुरंत “हाँ” न कहा होता, तो उनके भीतर “दिल टूट रस”, “बेचारा रस” और “मजनूं रस” उमड़ते और वे शायरी, कविताएँ व लेखों के माध्यम से एक बड़े लेखक बन जाते। मगर पत्नी ने उन्हें प्रेम-पत्र लिखने या भावुक कविताओं में ढलने का कोई अवसर ही नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि लेखक के भीतर मौजूद सारे “रस” वातावरण के अभाव में बाहर ही नहीं निकल पाए। लेख हल्के-फुल्के हास्य, नोकझोंक और आत्मव्यंग्य के माध्यम से यह संदेश देता है कि जीवन की दिशा और रचनात्मकता अक्सर निजी परिस्थितियों और रिश्तों से प्रभावित होती है।

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