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रंगोली

दिवाली नज़दीक थी, और हर साल की तरह श्रद्धा को ससुराल में ही त्योहार मनाना था, जबकि उसका मायका दो गली छोड़कर ही था। शादी के बाद से उसने कभी भी दिवाली के दिनों में माँ के आँगन में रंगोली नहीं बनाई, क्योंकि सास को उसका मायके जाना पसंद नहीं था। हर दिन वह ससुराल के आँगन में रंगोली बनाती, पर मन माँ के खाली आँगन में बसता, जहाँ अब रौनक खत्म हो चुकी थी। एक-दो बार मायके जाकर उसने देखा कि माँ आसपास के बच्चों से छोटी-सी रंगोली बनवाती हैं, पर न माँ ने उससे आने को कहा, न वह कह पाई। बात छोटी थी, पर कहने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाई। उसे हमेशा यह दर्द रहा कि वह बेटी होकर भी अपने घर जाने के लिए ससुरालवालों की अनुमति पर निर्भर है—शायद इसी वजह से लोग बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद अपने ही घर के लिए पराई हो जाती हैं।

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अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों के स्तर की है शिवसृष्टि की भव्यता

प्रसिद्ध अभिनेता प्रवीण तरडे ने पुणे की शिवसृष्टि का दौरा करते हुए कहा कि इसकी भव्यता और जीवंतता अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों के स्तर की है। उन्होंने शिवसृष्टि को छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य, स्वधर्म और स्वभाषा का सजीव अनुभव बताते हुए सभी मराठी नागरिकों से इसे देखने की अपील की।

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