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जय मां गंगा

“गंगा उदास है… मेरी गंगा उदास है।”
भगीरथ की तपस्या से धरती पर उतरी माँ गंगा आज मनुष्य के कर्मों से मलीन हो उठी है। कभी संतों के चरणों में बहकर जग का संताप हरने वाली मंदाकिनी, आज प्रदूषण और उपेक्षा से व्यथित है। अपनी ही संतान के हाथों अपवित्र होती इस पावन धारा का मौन करुण क्रंदन — हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण बन गया है।यह कविता केवल गंगा की वेदना नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विलाप है, जिसने अपनी ही संस्कृति के प्रतीक को आघात पहुँचाया है।

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