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लफ़्ज़ों के तीर

दायरे सिमटते रहे और दूरियाँ बढ़ती रहीं।
हर रोज़ खुद को तराशते गए, फिर भी कमियाँ निकलती रहीं। उसके बदले हुए लहजे तीर बनकर लगे,और हम हर गिरावट के बाद हुनर से फिर सँभलते रहे।

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