प्रेम

प्रेम हो जाना किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। ये मर्जी से नहीं आता, पर बहुत कुछ उजाड़ सकता है। जैसे नदियां लौट आती हैं अपने पुराने रास्तों पर, प्रेम भी तमाम वर्जनाओं को पार कर अपना रास्ता बना लेता है। प्रेम कोई पूर्णता नहीं, कोई गणना नहीं – ये मिट्टी की गंध, सूरज की तपिश और चाँदनी की ठंडक सा है। मैं नहीं जानती प्रेम क्या है, बस इतना जानती हूं कि इसकी खोज अनंत है – इस दुनिया के बाद की किसी नई दुनिया तक।

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