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वह सुबहें, वह होटल, वह जूनून

महिदपुर रोड की शंकर सेठ की होटल, और वहाँ डम्प होने वाले अखबार। बचपन का वह लड़का, जो फिल्मों के पोस्टर और शो टाइम्स जानने के लिए हर दिन सुबह निकल पड़ता।
पहले डर और हिचकिचाहट के साथ, धीरे-धीरे वह परिचितों में ढल गया—रामनिवास मंडोवरा काकाजी, कालू दा, चंद्रकांत जोशी। अखबारों के पन्नों में डूबते हुए उसका जुनून बन गया आदत, और फिर लत।शंकर सेठ की होटल सिर्फ एक जगह नहीं थी. वह वह मंच थी जहाँ बचपन की जिज्ञासा और सपने पत्रकारिता की दुनिया में बदलने लगे

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सागर सा वजूद

समुद्र की तरह व्यापक है हमारा वजूद, बस ज़रूरत है उसमें छिपे मोतियों को पहचानने की। जिसकी तलाश में हम दुनिया भर भटकते हैं, वह ख़ुद हमारे भीतर ही छिपा होता है सुकून भी, ख़ुदा भी। भटकते-भागते जीवन में कभी-कभी घर लौटकर देखना चाहिए, शायद वही ठहराव का असली स्थान हो। मन उदास हो तो आकाश की तरफ देखो—वही विशालता दिल को हल्का कर देती है। हार से पहले हार मत मानो; अवसर लौट-लौट कर आते हैं।

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आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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