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मंजिल

अकेलेपन और मार्गदर्शन की खोज का भावपूर्ण वर्णन है। लेखक अपने जीवन में उस पल का अनुभव कर रहा है जब न खुद की दिशा स्पष्ट है, न किसी और का ठिकाना। वह मंजिल और साथी की तलाश में अकेले खड़ा है, उम्मीद करता है कि कोई आए और उसे नए मार्ग की ओर ले जाए। यह एक आत्मान्वेषण और साथी की आवश्यकता की कविता है, जो जीवन में खोए हुए मार्ग और मिलने वाली नई मंजिल की प्रतीक्षा को उजागर करती है।

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