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प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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