Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

काश के फूल

डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा काश! मैं फूल होती काश कातुम्हारे मानस-पटल परपड़ी स्याह परतों परअपने नर्म-नर्म फूलों सेरुई के फाहे-सा ढक देती। ख़्वाहिशें जो तुम्हारीदबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों केउड़ते-हिलते फाहों सेसजा देती। बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरहकाश के फूल भी,पर शरद ऋतु आतेकहाँ रोक पाते खिलनेसे ख़ुद को! तेरे मन में भी…

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देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

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