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मन बंजारा

मन जैसे किसी अनजानी खोज में निकल पड़ा है। अब उसे ठहराव अच्छा नहीं लगता. तपती रेत भी उसे सुकून देती है. गर्म हवाओं के थपेड़े तन को झुलसा देते हैं, पर मन फिर भी मुस्कुरा उठता है। कभी कहीं से आती करुण पुकार उसे रुला देती है, तो कभी बिना कारण हँसी में डूब जाता है। माथे की बिंदिया, हाथों की चुड़ियाँ, झूलती बालियाँ .सब जैसे जीवन की थकान को सहला जाती हैं. रंग-बिरंगे घाघरों के बीच मटमैले सपने पलते हैं, और जब रात उतरती है, तो चाँदनी सबको अपनी गोद में सुला देती है.

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