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मुझे ऐतराज़ है…

यह लेख कैशलेस दौर के बीच घरेलू महिलाओं की उन छोटी-छोटी खुशियों को स्नेहिल व्यंग्य के साथ सामने रखता है, जो डिजिटल भुगतान की सुविधा में कहीं खो गई हैं। पति-पत्नी के साधारण संवाद के माध्यम से लेखिका स्मृतियों, आत्मसम्मान और भावनात्मक अधिकारों की बात करती हैं—जहाँ पति केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि भरोसेमंद “एटीएम” भी हुआ करते थे।

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