साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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प्रेम

प्रेम हो जाना किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। ये मर्जी से नहीं आता, पर बहुत कुछ उजाड़ सकता है। जैसे नदियां लौट आती हैं अपने पुराने रास्तों पर, प्रेम भी तमाम वर्जनाओं को पार कर अपना रास्ता बना लेता है। प्रेम कोई पूर्णता नहीं, कोई गणना नहीं – ये मिट्टी की गंध, सूरज की तपिश और चाँदनी की ठंडक सा है। मैं नहीं जानती प्रेम क्या है, बस इतना जानती हूं कि इसकी खोज अनंत है – इस दुनिया के बाद की किसी नई दुनिया तक।

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