बड़े दिलवाला
कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।

कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।
22 वर्ष की एक नवविवाहिता, दूर-दराज़ के सरकारी अस्पताल में तैनात पति और एक सुनसान सरकारी मकान। पति के दौरे पर चले जाने के बाद अकेलेपन से जूझती उस स्त्री की दुनिया माँ की यादों और किताबों के सहारे चलती है। एक सर्द रात खिड़की के बाहर चिड़िया की आवाज़ उसके भीतर दबे अतीत का ऐसा दरवाज़ा खोल देती है, जहाँ माँ का आँचल, अब्बा का दुलार और बचपन की सुरक्षित दुनिया फिर जीवित हो उठती है।
तीन दशक पहले मिली एक आदिवासी लड़की मीरा, जो पढ़ाई में बेहद होशियार थी और जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन परिस्थितियों ने उसकी राह रोक दी। वर्षों बाद हुई एक मुलाकात ने दोस्ती, सपनों और बिछड़ने की ऐसी कहानी छोड़ दी, जिसका सवाल आज भी कायम है मीरा तुम कहाँ हो?
एक संवेदनशील कहानी है जो पति-पत्नी के गहरे प्रेम, बीमारी की पीड़ा और बिछड़ने के मौन भय को हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करती है।
हर रोज मैट्रो स्टेशन पर भीख मांगती वह अंधी भिखारन मेरी नजरों के सामने होती।
एक दिन उसकी तबियत ठीक न होने पर मैंने देखा कि उसकी देखभाल एक जवान लड़की कर रही थी। कई सालों के दर्द और असहायता के बावजूद, उस बच्ची ने उसकी सेवा को अपना स्वाभिमान बना लिया। भीख मांगना नहीं, बल्कि सहयोग और मानवता की यही असली पहचान है।