जीवन
आदत जो बदलनी नहीं चाहिए
थकान भरे दिन के बाद उसका एक मैसेज आया “चाय बनाओ, खिड़की खोलो, और कविताएं लिखो, मानो मैं भी वहीं बैठा हूं।”वो न “आई लव यू” कहता है, न कोई नाटक करता है, फिर भी जाने कैसे सारी थकान मिटा देता है। शायद सच है .उम्र के इस पड़ाव पर प्यार शब्द नहीं माँगता, बस किसी का थोड़ा-सा होना ही काफी होता है।
अंधेरे …
यह कविता जीवन की अंधेरी राहों में प्रेम, परिवार और आत्मबल की रोशनी तलाशती है। कवि कहता है. अंधेरे चाहे कितना भी घेर लें, हम एक-दूसरे को छोड़कर नहीं जाएंगे। थकी हुई आत्मा को सहारा देने के लिए सच्चा प्रेम ही पर्याप्त है। रिश्तों की डोर अगर प्यार से जोड़ी जाए तो परिवार हमेशा साथ रहता है। समय के कठिन क्षणों में सब साथ छोड़ जाते हैं, फिर भी प्रेम और आशा के सितारे जगमगाते हैं।
अनदेखे से प्यार
मुझे किसी अनदेखे से प्यार है ऐसा प्यार जो किसी चेहरे, आवाज़ या उपस्थिति का मोहताज नहीं. वह बस मेरी कल्पना में बसा है, मेरी सोच में साँस लेता है. लोग कहते हैं, यह पागलपन है, पर अगर दिल को सुकून मिलता है तो इसे क्या नाम दूँ? एक बार किसी को दिल में जगह दे दी, तो वही मेरा सच बन गया. मुझे झूठ से हमेशा ऩफरत रही है, इसलिए यह एहसास भी पूरी सच्चाई से भरा है. मुझे जीवन के फूल ही नहीं, उसके काँटे भी प्रिय हैं क्योंकि दर्द भी तो किसी गहराई से आता है. मुझे उन खिड़कियों से प्यार है, जहाँ से मैं दुनिया को देखती हूँ वही खिड़कियाँ शायद उस अनदेखे तक पहुँचने का रास्ता हैं.
मन बंजारा
मन जैसे किसी अनजानी खोज में निकल पड़ा है। अब उसे ठहराव अच्छा नहीं लगता. तपती रेत भी उसे सुकून देती है. गर्म हवाओं के थपेड़े तन को झुलसा देते हैं, पर मन फिर भी मुस्कुरा उठता है। कभी कहीं से आती करुण पुकार उसे रुला देती है, तो कभी बिना कारण हँसी में डूब जाता है। माथे की बिंदिया, हाथों की चुड़ियाँ, झूलती बालियाँ .सब जैसे जीवन की थकान को सहला जाती हैं. रंग-बिरंगे घाघरों के बीच मटमैले सपने पलते हैं, और जब रात उतरती है, तो चाँदनी सबको अपनी गोद में सुला देती है.
मन की उड़ान और उसकी बेड़ियाँ
यह कविता मन की उस द्वंद्व यात्रा को बयाँ करती है जहाँ सपनों की उड़ान और समाज के बंधन आमने-सामने खड़े हैं। कवि कहता है — मन को बाँध कर रखो, क्योंकि उसकी उड़ानें सुविधाओं और परिस्थितियों की सीमाओं से टकराती हैं।
यह रचना उस गहराई को छूती है जहाँ स्वतंत्रता की चाह और जिम्मेदारियों की जकड़न एक साथ सांस लेती हैं।
“मिलन और बिछोह
**Excerpt:**
कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसे मिलते हैं जैसे उनका मिलना तय था — न पहले, न बाद में। वे आते हैं, अपना किरदार निभाते हैं और चले जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह जाती हैं उनकी यादें, फोन में उनका नंबर, कुछ जगहें जो अब भी उनकी मौजूदगी की खुशबू से भरी हैं। मिलना जितना सुख देता है, बिछड़ना उतना ही गहरा दर्द छोड़ जाता है।
एक मुलाकात दीवारों के साथ
एक दीवारों से मुलाकात का अनुभव, जहाँ बचपन, जवानी और यादों की आवाज़ें जीवंत हो उठती हैं। दीवारें सिर्फ मकान का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे एहसासों, मासूमियत और शरारतों की साझेदार होती हैं। समय के रंग और स्मृतियों की गूंज दीवारों पर जिंदा रहती है, और एक छोटी सी बॉल, एक बच्चा, और पुरानी यादें हमें हमारे अतीत की ओर खींच लेती हैं।
दरिया और किनारा
कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।
क्या होता है आखिर
जीवन में सब कुछ पाना शायद ही कभी संभव होता है। हर बार कुछ न कुछ बच जाता है — पूरा भर जाने के बाद भी रिक्तता का अनुभव बना रहता है। यह कुछ ऐसा है जैसे काले बादलों की ओंट में बचा थोड़ा सा पानी, या भोर की हल्की रोशनी में मिली रात की सहमी-सी कहानी।
प्रिय से मिलने के बाद उसका इंतजार, कटे हुए दरख़्त में फूटती नई हरित कोपलें, सुनसान जंगल में पंछियों के घोंसले, मंदिर की मूर्ति को बार-बार निहारने की इच्छा — ये सब दर्शाते हैं कि कुछ भी कभी पूरा नहीं होता। हमेशा कुछ-न-कुछ बच जाता है, आस-पास ही, जिसे महसूस करना और जीना ही जीवन का सच है।
