gulmohar

शिवालय

परम धाम शिवालय है, ऊर्जा से भरपूर सकारात्मकता का पुंज। शिवलिंग पर गंगाजल अर्पण, पंचोपचार पूजा और ॐ के जाप से होता कल्याण। श्रावण मास में भक्तों का शिवालय में उमड़ता हुजूम, हर हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं। महादेव को सिर्फ एक लोटा जल प्रसन्न कर देता है।”

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लव यू….टेक केयर

शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।”

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वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कललम्बे दिनऔर छोटी रातों मेंकई ख्वाबएक-सी शक्ल लिएआ रहे हैं और दिनबहुत देर सेअलसाई-सी शाम मेंतब्दील हो रहा नहीं-नहींये खूब तेजचुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं ये तो बस अभी-अभी आयेवसंत के पीले दिन हैंजो अचानकइस लॉक डाउन मेंप्रौढ़-से हो गए हैं इस बारहोली के सतरंगीदिनों के बादजाने क्यों इतनेबेरंग से हो गए हैंदिन-रात अपने जन्म…

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धर्म और मानवता पर चिंतन करते व्यक्ति के सामने ब्रह्मांड और पृथ्वी का प्रतीकात्मक दृश्य

अगर ईश्वर एक है तो हम क्यों बंटे हैं?”

एक इंसान अपने सृष्टिकर्ता से सवाल करता है कि जब रचनाकार एक है तो उसके नाम इतने अलग क्यों हैं? धर्म, हिंसा, युद्ध और मानवता पर तीखा व्यंग्यात्मक चिंतन.

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क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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जिंदगी कुछ इस तरह…

एक समय था जब मेरी पसंद की एक शाम हुआ करती थी — चाय की प्याली, साथ में वो दो होंठ, और मेरे दिल के सबसे करीब वो शहर। अब सब कुछ छूट चुका है। मेरी क्यारी का गुलाब, मेरे गाल का गुलाल, मेरी आँखों का काजल, यहाँ तक कि मेरे होठों की तपिश और जिस्म पर चुम्बन की कल्पना तक — कोई और ले गया। दो जिस्म एक धड़कन बनकर जिसे मैं अपना मान बैठा था, वो अब किसी और के दिल में बस गया। मेरे हर अज़ीज़ को रक़ीब अपने नाम कर गया।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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वो साल अच्छा था

“न ये हाल अच्छा है न वो हाल अच्छा था, इस साल से कह दो कि वो साल अच्छा था! इफरात में मिली मोहब्बत को जेब में रखने की जगह न थी, फटी जेब और तंग हाल ही अच्छा था।”

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रेत से ख़्वाब आँखों में आफ़ताब

ज़िंदगी हर रोज़ रेत-सी थोड़ी-थोड़ी फिसलती जाती है, और आँखों में ख्वाब आफ़ताब की तरह जलते हैं। कामयाबियों की चर्चा तो सब करते हैं, मगर नाकामियों से जब सामना हुआ था, उसका भी कभी हिसाब देना पड़ेगा। समाज की यही रीत है कि वह चैन से जीने नहीं देता और अनचाहे सवालों के जवाब मांगता है। दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी करतूतों की किताब खोलकर देखनी चाहिए। फकीर फकीर ही रहा, क्योंकि उसने चापलूसी नहीं की – वहीं नवाब बनते गए जो मीठी बातों में उलझे रहे। लेकिन जिसने सच कहा, वो हमेशा गलत समझा गया। फिर भी, अपने विश्वास की चाल न टूटी है, न टूटेगी।

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